विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 415, कुल 475 में से
संदर्भ में पढ़ें४०४ विनय-पत्रिका
॥२॥ दिलमें जान-बूझकर भी कुटिल (दुष्ट) मैं कर्मके कीचड़में चित्तको सान-
कर मलसे ही मलको धोना चाहता हूँ। मैं ऐसा दुष्ट प्यासा हूँ कि गंगाजीको
छोड़कर व्याकुल हो बारम्बार आकाश दुहता रहा (सच्चे सुखके लिए दुःखरूप
विषयोंमें उलझा रहा) ॥३॥ हे प्रभो ! अब तुलसीदासपर कृपा कीजिये, क्योंकि
मैंने अपना दोष तनिक भी आपसे नहीं छिपाया है। हे नाथ! मुझे बिछौना
बिछाते-बिछाते ही सारी रात बीत गयी (उपाय ही करते-करते जिन्दगी खतम हो
गयी), कभी भी नींद भर न सोया (आत्मसुख नहीं प्राप्त कर सका ) ॥४॥
विशेष
१—‘डासत······सोयो’—यहाँ जीवनको ‘निसा’ इसलिए कहा है कि
यह जीवन अज्ञानमय है, और अज्ञान अन्धकाररूप है।
[ २४६ ]
लोक-बेद हूँ विदित बात सुनि-समुझि
मोह-मोहित बिकल मति थिति न लहति ।
छोटे-बड़े, खोटे-खरे, मोटेऊ दूबरे,
राम ! रावरे निबाहे सबहीकी निबहति ॥१॥
होती जो आपने बस, रहती एक ही रस,
दुनी न हरष-सोक-साँसति सहति ।
चहतो जो जोई जोई, लहतो सो सोई सोई,
केहू भाँति काहू की न लालसा रहति ॥२॥
करम, काल, सुभाउ गुन-दोष जीव जग माया तें,
सो सबै भौंह चकित चहति ।
ईसनि-दिगीसनि, जोगीसनि-मुनीसनि हूँ,
छोड़ति छोड़ाये तें, गहायै तें गहति ॥३॥
सतरंज को सो राज, काठ को सबै समाज,
महाराज बाजी रची, प्रथम न हति ।
तुलसी प्रभुके हाथ हारिबो-जीतिबो नाथ !
बहु बेष, बहु मुख सारदा कहति ॥४॥