सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

पृष्ठ 353, कुल 475 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 353

३४२ विनय-पत्रिका
४—'षट् बरग'—परलोक-विरोधी भीतर स्थित शत्रुओंको कहते हैं ।
इन्हें अरिवर्ग भी कहते हैं। इनके नाम ये हैं—१ काम (प्राप्त वस्तुके भोगकी
इच्छा), २ क्रोध (द्वेष), ३ लोभ (अप्राप्त वस्तुकी प्राप्तिकी इच्छा), ४ मोह
(आत्मा अनात्मा अथवा शुभ-अशुभ कार्यका अविवेक), ५ मद (गर्व, अहङ्कार),
६ मत्सर (दूसरेकी वृद्धि देखकर जलना ।)
५—'सप्त धातु'—यह शरीर सात धातुओंसे बना हुआ है:—त्वचा
(चमड़ा), रक्त, मांस, मेद (चर्बी), मज्जा (अस्थिगत चिकना पदार्थ), अस्थि
(हड्डी) और रेत (शुक्र या वीर्य) ।
६—'आठ प्रकृति'—१ पृथिवी, २ जल, ३ अग्नि, ४ वायु, ५ आकाश,
६ मन (यहाँ मन शब्दसे समष्टि मन रूप अहङ्कार है), ७ बुद्धि (यहाँ समष्टि
बुद्धि रूप महत्तत्त्वका ग्रहण है) और ८ अहङ्कार (यहाँ महत्तत्त्वसे पूर्व शुद्ध
अहङ्कारके कारण अज्ञानरूप मूल प्रकृतिसे अभिप्राय है) ।
७—'निरबिकार'—पीछे छ विकारोंका उल्लेख किया जा चुका है ।
८—'नवद्वारपुर'—यह शरीर नौ द्वारका पुर है । वे नौ द्वार ये हैं--दो
आँखें, दो कान, दो नासिका, मुँह, मूत्रेन्द्रिय और गुदा । इसी प्रकार पुरी भी
आठ मानी गयी है—१ ज्ञानेन्द्रिय-पञ्चक (श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, जिह्वा और
घ्राण), २ कर्मेन्द्रिय-पञ्चक (वाक् , पाणि, पाद, उपस्थ और गुद), ३ अन्तः-
करणचतुष्टय (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार), ४ प्राणादि-पञ्चक (प्राण, अपान,
समान, उदान, और व्यान), ५ भूत-पञ्चक (पृथिवी, अप, तेज, वायु और
आकाश), ६ काम, ७ त्रिविध कर्म और ८ वासना ।
९—'चौदह भुवन'—भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम् ये सात
लोक ऊपरके हैं और अतल, वितल; सुतल, तलातल, रसातल, महातल और
पाताल ये सात नीचेके हैं।
१०—'भेद'—अर्थात् भेद-बुद्धि। वेदान्तशास्त्रने पाँच भेद माना है—
१ जीव ईश्वरका भेद, २ जीवोंका परस्पर भेद, ३ जीव-जड़का भेद, ४ जड़-
ईश्वरका भेद, ५ जड़-जड़का भेद। आत्मा इन पाँचों भेदोंसे रहित है।
अथवा सजातीय, विजातीय और स्वगत इन तीनों भेदोंसे आत्मा रहित है।
अपनी जातिवालोंसे जो सम्बन्ध है, उसे सजातीय सम्बन्ध कहते हैं, जैसे