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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 352

विनय-पत्रिका ३४१
दुःखोंको दूर करनेवाले और आनन्द-निधान केवल भगवान् ही हैं। किन्तु वह
(रामजी) साधुओंकी कृपा हुए बिना नहीं मिल सकते—चाहे कितने ही उपाय
क्यों न करो ॥१९॥ संसार-सागरसे पार होनेके लिए सन्तोंका पवित्र चरण ही
नाव है। तुलसीदास कहते हैं कि (सन्तोंके चरणरूपी नावके सहारे अर्थात्
सन्तोंकी चरण-सेवा करके) दुःखोंको हरनेवाले श्रीराम बिना परिश्रम ही मिल
जाते हैं ॥२०॥
विशेष
१—गुसाईंजीने इस पदमें बड़ा ही उपदेशप्रद रूपक बाँधा है। इसमें
उन्होंने सिद्धाभक्ति प्राप्त होनेतककी अवधिको ही एक पक्ष माना है। पक्षमें
पन्द्रह तिथियाँ होती हैं, अतः यहाँ भी क्रमशः पन्द्रह साधनोंका उल्लेख है।
'त्रिविध सूल'की होली भी खूब जलायी गयी है। चन्द्रमाकी सोलह कलाएँ
हैं। एक-एक तिथिमें एक-एक कलाकी वृद्धि होती है। ठीक इसी तरह काम-
शास्त्रमें सोलह कलाओंके नाम इस प्रकार दिये गये हैं—
‘पूषा यशा सुमनसा रतिः प्राप्तिस्तथा धृतिः।
ऋद्धिः सौम्या मरीचिञ्च तथा चैवांशुमालिनी ॥
अंगिरा शशिनी चेति छाया सम्पूर्णमंडला ।
तुष्टिश्चैवामृता चेति कलाः सोमश्च षोडश ॥’
भक्तवर वैजनाथजीने जीवकी भी षोडश कलाओंका उल्लेख किया है—
‘निराशा, सद्वासना, कीर्ति, जिज्ञासा, करुणा, मुदिता, स्थिरता, सुसङ्ग,
उदासीनता, श्रद्धा, लज्जा, साधुता, तृप्ति, क्षमा, विवेक, विद्या।'
२—‘द्वैत-मति'—जीव और ईश्वरको भिन्न समझनेवाली बुद्धि ।
३—'मुकुन्द'—का अर्थ है 'मुक्तिदाता' अर्थात् विष्णु । ब्रह्मवैवर्तके
श्रीकृष्णजन्म खण्डके ११० वें अध्यायमें इस शब्दकी व्युत्पत्ति इस प्रकार
लिखी है :—
'मुकुमन्ययमान्तंच निर्वाणमोक्षवाचकम् ।
तद्ददाति च यो देवो मुकुन्दस्तेन कीर्त्तितः ॥
मुकुं भक्तिरसप्रेम वचनं वेद सम्मतम् ।
यस्तद्ददाति विप्रेभ्यो मुकुन्दस्तेन कीर्त्तितः ॥'