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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 336

विनय-पत्रिका ३२५
रीझि निवाज्यो कबहिं तू, कब खीझि दई तोहिं गारि ।
दरपन बदन निहारि कै, सुविचारि मान हिय हारि ॥२॥
विगरी जनम अनेक की सुधरत पल लगै न आधु ।
'पाहि कृपानिधि' प्रेम सों कहे को न राम कियो साधु ॥३॥
वाल्मिकि-केवट-कथा, कपि-भील-भालु-सनमान ।
सुनि सनमुख जो न राम सों, तिहि को उपदेसहि ग्यान ॥४॥
का सेवा सुग्रीवकी, का प्रीति-रीति-निरवाहु ।
जासु बन्धु वध्यो व्याध ज्यों, सो सुनत सोहात न काहु ॥५॥
भजन विभीषन को कहा, फल कहा दियो रघुराज ।
राम गरीब-निवाजके बड़ी बाँह-बोल की लाज ॥६॥
जपहि नाम रघुनाथ को, चरचा दूसरी न चालु ।
सुमुख, सुखद, साहिब, सुधी, समरथ, कृपालु, नतपालु ॥७॥
सजल नयन, गदगद गिरा, गहवर मन, पुलक सरीर ।
गावत गुनगन राम के केहि की न मिटी भव-भीर ॥८॥
प्रभु कृतग्य सरबग्य हैं, परिहरु पाछिली म्लानि ।
तुलसी तोसों राम सों कछु नई न जान-पहिचानि ॥९॥
शब्दार्थ—बदन = मुख । बाँह-बोल = रक्षा करनेका वचन । चालु = चलाओ ।
सुधी = बुद्धिमान । गहवर = प्रेमपूर्ण । भीर = दुःख ।
भावार्थ—रे जीव ! अब भी अपने और रामजीके करतबोंको समझनेसे तेरी
भलाई हो सकती है। कहाँ तू है और कहाँ कोशलधनी श्रीरामजी ! फिर भी तुझे
सब लोग क्या कहते हैं (यही न, कि तू रामका दास है) ? ॥१॥ रामजीने कब
तुझपर प्रसन्न होकर कृपा की है और कब खीझकर तुझे गालियाँ दी हैं ? जरा
(विवेकरूपी) दर्पणमें अपना मुँह तो देख; उसके बाद उसपर अच्छी तरह
विचार करके हृदयमें हार मान ले—लज्जित हो जा (क्योंकि विचार करनेपर
तुझे मालूम हो जायगा कि रामजी तुझपर सदासे कृपा करते आ रहे हैं, पर तू
घोर अपराधी है, किन्तु विचार करनेके बाद तू यह न समझ ले कि तेरा सुधार
ही न होगा ॥२॥ अनेक जन्मोंकी बिगड़ी हुई बातें सुधारनेमें उन्हें आधा पल