विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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जो पै जानकिनाथ सों नातो नेहु न नीच।
स्वारथ-परमारथ कहा, कलि कुटिल विगोयो बीच ॥१॥
धरम वरन आस्रमानि के पैयत पोथि ही पुरान।
करतव बिनु बेष देखिये, ज्यों सरीर बिनु प्रान ॥२॥
वेद विदित साधन सबै, सुनियत दायक फल चारि।
राम-प्रेम बिनु जानिबो जैसे सर-सरिता बिनु वारि ॥३॥
नाना पथ निरबान के, नाना विधान बहु भाँति।
तुलसी तू मेरे कहे जपु राम-नाम दिन-राति ॥४॥
शब्दार्थ—विगोयो = खो दिया। सर = तालाब। सरिता = नदी। निरबान = मोक्ष।
भावार्थ—रे नीच ! यदि रामजीसे तेरा स्नेह और नाता नहीं है, तो क्या
स्वार्थ और क्या परमार्थ दोनोंको ही तूने कुटिल कलिकालके बीचमें खो दिया
॥१॥ वर्ण और आश्रमके धर्म केवल पोथियों और पुराणोंमें ही लिखे पाये जाते हैं
(अर्थात् ये केवल लिखने-पढ़नेकी वस्तुमात्र रह गये हैं, इनके अनुसार कोई भी
मनुष्य आचरण नहीं करता)। कर्तव्य कुछ भी नहीं रह गया है, केवल वेष देख
लीजिये। यह ठीक वैसा ही है जैसे बिना प्राणका शरीर ॥२॥ सुनते हैं कि वेदों-
में विदित सब साधन अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष ये चारों फल देनेवाले हैं,
किन्तु यह जान लेना चाहिये कि राम-प्रेमके बिना सब साधन वैसे ही हैं जैसे
जलके बिना तालाब और नदियाँ ॥३॥ निर्वाण-प्राप्तिके अनेक मार्ग हैं और
नाना प्रकारके बहुतसे विधान भी हैं; किन्तु हे तुलसी ! तू मेरे कहनेसे (उन
सबको छोड़कर) दिनरात केवल राम-नाम जप ॥४॥
विशेष
१—'निरबान'—महाभारतके शान्ति पर्वमें मोक्षधर्म प्रकरण पढ़ने और
मनन करने योग्य है। वहाँ 'निर्वाण'-प्राप्तिके अनेक मार्गोंका उल्लेख है।
[ १९३ ]
अजहुँ आपने रामके करतब समुझत हित होइ।
कहँ तू, कहँ कोसलधनी, तोको कहा कहत सब कोइ ॥१॥