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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 332

विनय-पत्रिका ३२१
जासों सब नातो फुरै, तासों न करी पहिचानि।
तातें कछू समुझ्यो नहीं, कहा लाभ कह हानि ॥५॥
साँचो जान्यो झूठ को, झूठे कहँ साँचो जानि।
को न गयो, को जात है, को न जैहै करि हितहानि ॥६॥
वेद कह्यो, बुध कहत हैं, अरु हौहुँ कहत हौं टेरि।
तुलसी प्रभु साँचों हितू, तू हिय की आँखिन हेरि ॥७॥
शब्दार्थ—मुकुर = दर्पण। अनुहारि = सदृशता । खरि = खली। मेचक = श्याम।
फुरै = सच्चे होते हैं। बुध = पण्डित।
भावार्थ—तूने स्वाभाविक स्नेह करनेवाले श्रीरामजीसे सहज स्नेह नहीं
किया ! इसीसे तू संसार-पात्र (बार-बार संसारमें जन्म लेने योग्य) हुआ है। अब
भी तू मेरी यह शिक्षा सुन ॥१॥ जैसे दर्पणमें मुखका प्रतिबिम्ब दिखाई पड़ता
है और उस दर्पणके भीतर उसकी वस्तुतः आकृति नहीं रहती, वैसे ही ये माता,
पिता, पुत्र, स्त्री आदि सेवा करते हुए भी अपने नहीं हैं ॥२॥ जैसे फूल दे-देकर
तिलको बासा जाता है और उसका रस (तेल) निकालकर खली त्याग दी जाती
है, वैसे ही स्वार्थके लिए हित या सम्बन्धी बननेवाले ऐसे लोग पृथिवीपर भरे पड़े
हैं जिनका मन काला है और शरीर स्वच्छ ॥३॥ तू अगणित मित्र बना चुका,
अब भी बना रहा है और आगे चलकर अपनी भलाईके लिए बनायेगा, किन्तु
श्रीरामजीके समान स्नेह निभानेवाला मित्र कभी भी कोई नहीं मिल सकता ॥४॥
जिसके साथ सब नाते सच्चे हैं, उसके साथ तो तूने जान-पहचान ही नहीं की!
इससे कहना पड़ता है कि तूने अभीतक कुछ समझा ही नहीं कि क्या लाभ है
और क्या हानि ॥५॥ तूने झूठको ही सच मान रखा है; किन्तु झूठको सच
माननेवाला ऐसा कौन है जो अपने हितकी हानि करके नहीं चला गया, नहीं
जा रहा है और न जायगा ? ॥६॥ वेदोंने कहा है, पंडित कहते हैं और मैं भी
पुकारकर कहता हूँ कि तुलसीके प्रभु श्रीरामजी ही सच्चे हितू हैं। जरा तू अपने
हृदयकी आँख खोलकर देख (बात सच है या नहीं) ॥७॥
विशेष
१—'जासों सब नातो फुरै'—इसपर गोस्वामीजीकी एक सवैया बहुत
बढ़िया है:—
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