विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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आप तुलसीदासको अपना दास बना लीजिये—मैं बिना मोल (आपके हाथ)
बिकना चाहता हूँ ! तात्पर्य यह है कि मैं निष्काम सेवक बनना चाहता हूँ॥३॥
[ १५४ ]
देव ! दूसरो कौन दीन को दयालु ।
सील-निधान सुजान-सिरोमनि, सरनागत-प्रिय प्रनत-पालु ॥१॥
को समरथ सर्वग्य सकल प्रभु, सिव-सनेह-मानस-मरालु ।
को साहिब किये मीत प्रीति बस खग निसिचर कपि भील भालु॥२
नाथ हाथ माया-प्रपंच सब, जीव-दोष-गुन-करम-कालु ।
तुलसिदास भलो पोच रावरो, नेकु निरखि कीजिय निहालु॥३॥
भावार्थ—हे देव ! (आपके सिवा) दीनोंपर दया करनेवाला दूसरा कौन
है ? आप शील-निधान, ज्ञानियोंमें शिरोमणि, शरणागतोंके परम प्रिय और भक्तों-
के पालनेवाले हैं ॥१॥ आपके समान सामर्थ्यवान, सर्वज्ञ और सबका स्वामी
कौन है ? आप शिवजीके स्नेहरूपी मानसरोवरमें (विहार करनेवाले) हंस हैं ।
(आपके सिवा) किस स्वामीने प्रेमवश पक्षी (जटायु), निशाचर (विभीषण),
बन्दर (सुग्रीव), भील (निषाद) और भालुओं (जामवन्त आदि) को अपना मित्र
बनाया है ? ॥२॥ हे नाथ ! मायाके प्रपंच, जीवोंके दोष, गुण कर्म और काल
सब आपके हाथ हैं । यह तुलसीदास भला हो या बुरा, आपका ही है । जरा
इसकी ओर देखकर इसे निहाल कर दीजिये ॥३॥
विशेष
१—‘खग’—जटायु; २१५वें पदके विशेषमें देखिये ।
राग सारङ्ग
[ १५५ ]
बिस्वास एक राम-नाम को ।
मानत नहिं परतीति अनत ऐसोइ सुभाव मन वाम को ॥१॥
पढ़िबो परचो न छठी छ मत रिगु जजुर अथर्बन सामको ।
व्रत तीरथ तप सुनि सहमत पचि मरै करै तन छाम को ? ॥२॥