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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 268, कुल 475 में से

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पृष्ठ 268

विनय-पत्रिका २५७
मानत नाहिं निगम अनुसासन, त्रास न काहू केरो।
भूल्यो सूल करम-कोल्हुन तिल ज्यों बहु बारनि पेरो ॥२॥
जहँ सतसंग कथा माधव की, सपनेहुँ करत न फेरो।
लोभ-मोह-मद-काम-कोह-रत, तिन्ह सों प्रेम घनेरो ॥३॥
पर-गुन सुनत दाह, पर-दूषन सुनत हरष बहुतेरो।
आपु पाप को नगर बसावत, सहि न सकत पर खेरो ॥४॥
साधन-फल, स्रुति-सार नाम तव, भव-सरिता कहँ बेरो।
सो पर-कर काकिनी लागि सठ, वेंचि होत हठ चेरो ॥५॥
कवहूँक हौं संगति-प्रभाव ते, जाउँ सुमारग नेरो।
तव करि क्रोध संग कुमनोरथ देत कठिन भटभेरो ॥६॥
इक हौं दीन, मलीन, हीन मति, विपति-जाल अति घेरो।
तापर सहि न जाय करुनानिधि, मन को दुसह दरेरो ॥७॥
हारि पर्यो करि जतन बहुत बिधि, तातें कहत सबेरों।
तुलसिदास यह त्रास मिटै जब हृदय करहु तुम डेरो ॥८॥
शब्दार्थ—अनेरो = व्यर्थ, बिना प्रयोजन । घनेरो = गहरा । खेरो = खेड़ा, छोटी
बस्ती । बेरो = बेड़ा । काकिनी = पाँच गंडा कौड़ी, कौड़ी, छदाम । नेरो = निकट । भटभेरो =
अड़चन, बाधा । दरेरो = धक्का, रगड़ना । पर्यो = गिर पड़ा । सबेरो = शीघ्र ।
भावार्थ- हे राम ! हे रघुवीर स्वामी ! सुनिये, मेरा मन अन्यायमें लीन है ।
वह आपके चरण-कमलोंको भूलकर रात-दिन बेकार चक्कर काटा करता
है ॥१॥ न तो वह वेदाज्ञा मानता है, और न उसे किसीका भय है । बहु अनन्त
बार कर्मके कोल्हुओंमें तिलकी तरह पेरा गया, पर उस व्यथाको भूल गया ॥२॥
जहाँ सत्संग होता है, भगवान्‌की कथा होती है, वहाँ वह स्वप्नमें भी नहीं जाता ।
परन्तु जो लोग लोभ, मोह, मद, काम और क्रोधमें रत हैं, उनसे उसका गहरा
प्रेम है ॥३॥ दूसरेका गुण सुनकर उसे बड़ी जलन होती है; और दूसरे का
दोष सुननेपर बड़ा हर्ष होता है । खुद तो पापोंका नगर बसा रहा है, पर दूसरेका
(पापका) खेड़ा अर्थात् थोड़ासा पाप भी वह सहन नहीं कर सकता ॥४॥
आपका नाम सब साधनोंका फल है, वेदोंका सार है, तथा संसाररूपी नदीके
लिए बेड़ा है। वह दुष्ट उसे (आपके नामको) पाँच गण्डा कौड़ियोंके लिए
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