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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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२३० विनय-पत्रिका
[ १३४ ]
ताते हौं बार बार देव ! द्वार परि पुकार करत ।
आरति, नति, दीनता कहे प्रभु संकट हरत ॥१॥
लोकपाल सोक-बिकल रावन-डर डरत ।
का सुनि सकुचे कृपालु नर-सरीर धरत ॥२॥
कौसिक, मुनि-तीय, जनक सोच-अनल जरत ।
साधन केहि सीतल भये, सो न समुझि परत ॥३॥
केवट, खग, सबरि सहज चरन-कमल न रत ।
सनमुख तोहिं होत नाथ ! कुतरु सुफरु परत ॥४॥
बंधु-बैर कपि-बिभीषन गुरु गलानि गरत ।
सेवा केहि रीझि राम, किये सरिस भरत ॥५॥
सेवक भयो पवनपूत साहिब अनुहरत ।
ताको लिये नाम राम सब को सुढर ढरत ॥६॥
जाने बिनु राम-रीति पचि पचि जग मरत ।
परिहरि छल सरन गये तुलसिहुँ-से तरत ॥७॥
शब्दार्थ—नति = नम्रता । कुतरु = बुरे वृक्ष । सुफरु = सुन्दर फल । कपि = सुग्रीव
गुरु = भारी । पवन-पूत = वायुके पुत्र हनुमान्‌जी । अनुहरत = अनुहारि करने लगे ।
भावार्थ—हे देवाधिदेव ! मैं आपके द्वारपर पड़ा हुआ इसलिए बार-बार
पुकार कर रहा हूँ कि आप नम्रतापूर्वक दुःख, और दीनता कहनेपर संकट हर
लेते हैं ॥१॥ जब कुबेर, इन्द्र आदि लोकपाल रावणके डरसे डरकर शोक-व्याकुल
हो गये थे, तब हे कृपालु ! आपने कौन-सी बात सुनकर संकोच किया था और
मनुष्यशरीर धारण किया था ? ॥२॥ यह बात मेरी समझमें नहीं आती कि
शोकाग्निसे जलते हुए विश्वामित्र, अहिल्या और जनक किस साधनसे शीतल
हुए थे ॥३॥ आपके चरण-कमलोंमें गुह, निषाद, जटायु पक्षी, शबरी आदिका
सहज-प्रेम नहीं था । किन्तु हे नाथ ! आपके सम्मुख आते ही बुरे वृक्ष भी उत्तम
फल फलने लगते हैं ॥४॥ भाई-(बालि और रावण) के बैरसे सुग्रीव और
विभीषण भारी ग्लानिसे गले जा रहे थे । हे रामजी ! आपने उन्हें किस सेवापर