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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 225

२१४ विनय-पत्रिका
हृषीकेस सुनि नाउँ जाउँ बलि, अति भरोस जिय मोरे।
तुलसिदास इंद्रिय-संभव दुख, हरे बनहि प्रभु तोरे ॥५॥
शब्दार्थ—सूतहिं = सोते हैं। विपरीत = उलटा। विधिवस = विधाताकी इच्छासे।
हृषीकेस = (हृषीक + ईश) इन्द्रियोंके स्वामी। संभव = उत्पन्न।
भावार्थ—हे हरे! (यह सांसारिक भ्रम) किस उपायसे दूर होता है? यह मन
(संसारका मिथ्यात्व) देख रहा है, सुन रहा है, सोच रहा है, फिर भी अपना
स्वभाव नहीं छोड़ रहा है ॥१॥ भक्ति, ज्ञान, वैराग्य आदि सब साधन इसीके
(मनको, स्थिर करनेके) लिए उपाय हैं। फिर भी 'कोई मुझे अच्छा कहे,' 'कोई
कुछ दे', ऐसी वासना मेरे हृदयसे नहीं जाती ॥२॥ जिस (संसार) रात्रिमें सब
प्राणी सोते हैं, उसमें आपके कृपापात्र भक्त जागते हैं। किन्तु अपनी करनीको
विपरीत देखकर उसे समझनेपर मुझे बड़ा डर लग रहा है ॥३॥ यद्यपि विधाताकी
इच्छासे लोगोंका मनोरथ भंग हो जाता है, और वे सुखकी इच्छा करनेमें वैसे
ही दुःख पाते हैं जैसे बिना हाथका चित्रकार बिना स्वार्थके ही (मनोकल्पित)
चित्र बनाता है (अर्थात् चित्रोंसे अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहता है, पर हाथ न
रहनेके कारण भग्न-मनोरथ होकर दुःख पाता है) ॥४॥ आपका 'हृषीकेश' नाम
सुनकर मैं आपकी बलैया लेता हूँ। मेरे जीमें आपका बहुत बड़ा भरोसा है। हे
प्रभो ! तुलसीदासका इन्द्रिय-जन्य दुःख आपको अवश्यमेव दूर करना पड़ेगा
(क्योंकि आप हृषीकेश अर्थात् इन्द्रियोंके स्वामी हैं) ॥५॥
विशेष
१—'जेहिनिसि··जागै'—यह बात गीतामें भगवान्‌ने भी कही है—
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥
—भगवद्गीता, अध्याय २, श्लोक ६९ ।
( १२० )
हे हरि ! कस न हरहु भ्रम भारी।
जद्यपि मृषा सत्य भासै जब लगि नहिं कृपा तुम्हारी ॥१॥