विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका २०३
अपने दिलमें यह जानकर मुझपर नहीं पिघल रहे हैं कि मैं कर्म-हीन (भाग्य-हीन)
हूँ ? ॥३॥ हे रघुनाथजी ! मैं अनेक योनियोंमें भ्रम रहा हूँ, मेरे लिए दूसरा कोई
स्वामी नहीं है। इसीसे मैं दुःख-सुख सहता हुआ सदा आपकी शरणमें आकर
रहता हूँ ॥४॥ आपके समान कृपालु दूसरा कोई भी देवता नहीं है, यह मैं अपने
मनमें खूब समझ रहा हूँ। किन्तु हे नाथ ! आप तुलसीदासको सन्तोष दीजिये,
क्योंकि (मेरे पास) वह साधन नहीं है जिससे आप प्रसन्न होते हैं। अर्थात् तुलसी-
दास भाग्य और उपाय दोनोंसे रहित है, आप ही उसका कल्याण करें ॥५॥
( ११० )
कहु केहि कहिय कृपानिधे ! भव-जनित विपति अति ।
इंद्रिय सकल विकल सदा, निज निज सुभाउ रति ॥१॥
जे सुख-संपति, सरग नरक संतत सँग लागी ।
हरि ! परिहरि सोइ जतन करत मन मोर अभागी ॥२॥
मैं अति दीन, दयालु देव सुनि मन अनुरागे ।
जो न द्रवहु रघुवीर धीर, दुख काहे न लागे ॥३॥
जद्यपि मैं अपराध-सदन, दुख-समन मुरारे ।
तुलसिदास कहँ आस इहैं बहु पतित उधारे ॥४॥
शब्दार्थ—विकल = व्याकुल। मोर = मेरा।
भावार्थ—हे कृपानिधे ! कहिये, संसार-जनित भारी विपत्तियोंको मैं किससे
कहूँ ? सब इन्द्रियाँ अपने-अपने स्वभावकी प्रीतिमें सदा विकल रहती हैं ॥१॥
हे हरे ! मेरा अभागा मन भी आपको छोड़कर वही यत्न कर रहा है जिससे
सुख-सम्पत्ति, स्वर्ग-नरकका बखेड़ा सदैव साथ लगा रहे ॥२॥ मैं अत्यन्त दीन
हूँ। देव (श्रीरामजी) दयालु हैं, यह सुनकर मनमें प्रसन्नता हुई। हे धैर्यवान्
श्रीरघुनाथजी ! यदि आप द्रवीभूत न होंगे तो भला मुझे दुःख कैसे न
होगा ? ॥३॥ यद्यपि मैं अपराधोंका घर हूँ, पर हे मुरारे ! आप तो दुःखोंका
शमन करनेवाले हैं न ! तुलसीदासको यही भरोसा है कि आपने बहुत-से पतितों-
को तार दिया है (इसलिए तुलसीदासको भी तारेंगे) ॥४॥