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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 199

१८८ विनय-पत्रिका
सब साधनोंसे हीन तथा दुबला-पतला और कौन है ! किन्तु (राम) नाम-रूपी
राजाके प्रबल प्रतापसे संसारमें युग-युगसे चमड़ेका सिक्का भी चलता आ रहा
है ! अभिप्राय यह है कि राम नामकी महिमासे अधमसे अधम जीव भी मुक्त
होते आये हैं ॥४॥
विशेष
'सुदामा'—सुदामा भगवान् कृष्णके सखा थे । वह बहुत ही गरीब थे ।
अपनी स्त्रीके कहने-सुननेपर वह भेंट देनेके लिए चार मुट्ठी चावल लेकर भग-
वान्‌से मिलनेके लिए द्वारका गये । भगवान्‌ने उनका बड़ा आदर किया और
उन्हें समृद्धिशाली बना दिया । कृष्ण-सुदामा-सम्मिलनपर नीचेकी रचना बहुत
ही उत्तम है:—
ऐसे बिहाल बिवाइन ते मग कंटक जाल गड़े पुनि जोये ।
हाय महा दुख पायो सखा तुम आयो इतै न कितै दिन खोये ॥
देखि सुदामा की दीन दसा करुना करिकै करुनामय रोये ।
पानी परात कै हाथ छुयो नहिं नैनन के जलते पग धोये ॥
१०० ]
सुनि सीतापति-सील-सुभाउ ।
मोद न मन, तन पुलक, नयन जल, सो नर खेहर खाउ ॥१॥
सिसुपनते पितु, मातु, बन्धु, गुरु, सेवक, सचिव, सखाउ ।
कहत राम-बिधु बदन रिसौहैं सपनेहुँ लख्यो न काउ ॥२॥
खेलत संग अनुज बालक नित, जोगवत अनट अपाउ ।
जीति हारि चुचुकारि दुलारत, देत दिवावत दाउ ॥३॥
सिला साप-संताप-बिगत भइ, परसत पावन पाउ ।
दई सुगति सो न हेरि हरष हिय, चरन छुए (को) पछिताउ ॥४॥
भव-धनु भंजि निदरि भूपति भृगुनाथ खाइ गये ताउ ।
छमि अपराध, छमाइ पाँय परि, इतौ न अनत समाउ ॥५॥
कह्यो राज, बन दियो नारिब्स, गरि गलानि गयो राउ ।
ता कुमातु को मन जुगवत ज्यौं निज तनु मरम कुघाउ ॥६॥