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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 193

१८२ विनय-पत्रिका
उस समय मित्रवर 'निराला'जी भी मौजूद थे । ऊपरका अर्थ सुनकर सब लोग
खूब हँसे ।
४-'तौ हरि···तजि गारो'—इस पंक्तिका भी वियोगी हरि आदि सब
टीकाकारोंने बड़ा ही ऊटपटाँग अर्थ किया है । विस्तार-भयसे उसे यहाँ
उद्धृत करना अनावश्यक है ।
९५ )
तऊ न मेरे अघ-अवगुन गनिहैं ।
जौ जमराज काज सब परिहरि, इहै ख्याल उर अनिहैं ॥१॥
चलिहैं छूटि पुंज पापिन के, असमंजस जिय जनिहैं ।
देखि खलल अधिकार प्रभूसों मेरी भूरि भलाई भनिहैं ॥२॥
हँसि करिहैं परतीति भगत की, भगत-सिरोमनि मनिहैं ।
ज्यौं त्यौं तुलसिदास कोसलपति अपनायेहि पर बनिहैं ॥३॥
शब्दार्थ—तऊ = तो भी । अनिहैं = लावेंगे । पुंज = समूह । खलल = विघ्न । भनिहैं =
कहेंगे । मनिहैं = मानेंगे ।
भावार्थ—यदि यमराज सब काम छोड़कर यही विचार (केवल मेरे पापों-
का लेखा लगाना ही) अपने दिलमें लावेंगे, तो भी वह मेरे पापों और दुर्गुणों-
को न गिन सकेंगे ॥१॥ (उस दशामें) पापियोंके दलके दल भाग खड़े होंगे,
और तब यमराज अपने दिलमें उस समयका असमंजस समझेंगे । फिर तो वह
अपने अधिकारमें विघ्न पड़ते देखकर भगवान्‌से मेरी भूरि-भूरि प्रशंसा करेंगे
॥२॥ उनके (मुखसे प्रशंसा सुनकर) आप भी हँसकर मुझ भक्तका विश्वास
करेंगे और मुझे भक्तशिरोमणि मान लेंगे । हे कोशलेश ! आपको जैसे-तैसे इस
तुलसीदासको अपनाना ही पड़ेगा ॥३॥
विशेष
१—'खलल'—यह शब्द फारसीका है ।
( ९६ )
जौ पै जिय धरिहौ अवगुन जनके ।
तौ क्यौं कटत सुकृत नखते मो पै, विपुल बूंद अघ-बनके ॥१॥