विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका १३५
राग-असावरी
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इहै परम फलु, परम बड़ाई ।
नख-सिख रुचिर बिन्दुमाधव छवि निरखहिं नयन अघाई ॥१॥
विसद किसोर पीन सुंदर वपु, स्याम सुरुचि अधिकाई ॥
नील कंज, वारिद, तमाल, मनि, इन्ह तनुते दुति पाई ॥२॥
मृदुल चरन सुभ चिन्ह, पदज, नख, अति अभूत उपमाई ।
अरुन नील पाथोज प्रसव जनु, मनिजुत दल-समुदाई ॥३॥
जातरूप मनि-जटित मनोहर, नूपुर जन-सुखदाई ।
जनु हर-उर हरि विविध रूप धरि, रहे घर भवन बनाई ॥४॥
कटितट रटति चारु किंकिन-रव, अनुपम, बरनि न जाई ।
हेम जलज कल कलित मध्य जनु, मधुकर मुखर सुहाई ॥५॥
उर विसाल भृगुचरन चारु अति, सूचत कोमलताई ।
कंकन चारु विवध भूषन विधि, रचि निज कर मन लाई ॥६॥
गज-मनिमाल वीच भ्राजत कहि जाति न पदक निकाई ।
जनु उडुगन-मंडल वारिदपर, नवग्रह रची अयाई ॥७॥
भुजंगभोग-भुजदंड कंज, दर, चक्र, गदा वनि आई ।
सोभासीव ग्रीव, चिबुकाधर, वदन अमित छवि छाई ॥८॥
कुलिस, कुंद-कुडमल, दामिनि-दुति, दसनन देखि लजाई ।
नासा-नयन-कपोल, ललित श्रुति कुंडल भ्रू मोहिं भाई ॥९॥
कुंचित कच सिर मुकुट, भालपर, तिलक कहाँ समुझाई ।
अलप तड़ित जुग रेख इंदु महँ, रहि तजि चंचलताई ॥१०॥
निरमल पीत दुकूल अनूपम, उपमा हिय न समाई ।
बहु मनिजुत गिरि नील सिखरपर, कनक-बसन रुचिराई ॥१०॥
दच्छ भाग अनुराग-सहित इंदिरा अधिक ललिताई ।
हेमलता जनु तरु तमाल ढिग, नील निचोल ओढ़ाई ॥१२॥