विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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यस्यांघ्रिपाथोज अज-संभु-सनकादि, सुक-
सेप, मुनिवृंद अलि निलयकारी ॥१॥
अमल मरकत स्याम, काम सतकोटि छवि,
पीत पट तड़ित इव जलद नीलं।
अरुन सतपत्र लोचन, बिलोकनि चारु,
प्रनत जन-सुखद, करुनार्द्रसीलं ॥२॥
काल-गजराज-मृगराज, दनुजेस-वन-
दहन पावक, मोह-निसि-दिनेसं।
चारि भुज चक्र-कौमोदकी-जलद-दर,
सरसिजोपरि जथा राजहंसं ॥३॥
मुकुट, कुंडल, तिलक, अलक अलिब्रात इव,
भ्रुकुटि, द्विज, अधर वर, चारु नासा।
रुचिर सुकपोल, दर ग्रीव सुख-सीव, हरि,
इंदुकर-कुंदमिव मधुर हासा ॥४॥
उरसि वनमाल सुविसाल नव-मंजरी,
भ्राज श्रीवत्स-लांछन उदारं।
परम ब्रह्मन्य, अति धन्य, गतमन्यु, अज,
अमित बल, विपुल महिमा अपारं ॥५॥
हार केयूर, कर कनक कंकन रतन—
जटिल मनि-मेखला कटि प्रदेसं।
युगल पद नूपुरामुखर कलहंसवत् ,
सुभग सर्वांग सौंदर्य वेसं ॥६॥
सकल सौभाग्य-संयुक्त त्रैलोक्य, श्री
दच्छि दिसि रुचिर वारीस-कन्या।
वसत विवुधापगा निकट तट सदन वर,
नयन निरखंति नर तेऽति धन्या ॥७॥
अखिल मंगल-भवन, निविड़संसय समन,
दमन-वृजनाटवी, कष्टहर्त्ता।