विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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प्रबल अहँकार दुरघट महीधर, महा-
मोह गिरि-गुहा निविड़ांधकारं ।
चित्त बेताल, मनुजाद मन, प्रेतगन,
रोग भोगौध वृश्चिक-विकारं ॥६॥
विषय-सुख-लालसा दंस-मसकादि, खल
झिल्लि रूपादि सब सर्प, स्वामी ।
तत्र आक्षिप्त तव विषम माया नाथ,
अंध मैं मंद, व्यालादगामी ॥७॥
घोर, अवगाह भव आपगा पाप जल-
पूर, दुष्प्रेक्ष्य, दुस्तर, अपारा ।
मकर षड्वर्ग, गोनक्र-चक्राकुला,
कूल सुभ-असुभ, दुख तीव्र धारा ॥८॥
सकल संघट पोच सोचवस सर्वदा,
दास तुलसी विषम गहन-ग्रस्तं ।
त्राहि रघुबंस-भूषन कृपाकर, कठिन
काल बिकराल-कलित्रास-त्रस्तं ॥९॥
शब्दार्थ—नर्मद = सुख देनेवाले । कांतार = वन । खर = तीक्ष्ण, नुकीले । श्येनोलोक =
(श्येन+उलूक) बाज और उल्लू । आमिष = मांस । छिद्र = दोष । खेद = दुःख । कंदर्प =
कामदेव । वृक = भेड़िया, हुँडार । महिष = भैंसा । फेरु = सियार । मार्जार = बिल्ली, बिलाव ।
ब्रात = समूह । मनुजाद = नरभक्षक, मनुष्यको खानेवाला । वृश्चिक = बिच्छू । आक्षिप्त = फेंक
दिया है । आपगा = नदी । कूल = किनारा । पोच = नीचा । संघट = एकत्र । त्रास = भय ।
भावार्थ—हे देव ! आप दीनोंका उद्धार करनेवाले, रघुकुलमें श्रेष्ठ, करुणा-
निधान, सन्तापोंका शमन करनेवाले तथा पाप-समूहको हर लेनेवाले हैं । आप
विमल विज्ञान-शरीरवाले, कृपाके रूप, राजाओंमें श्रेष्ठ, देवताओंको सुख देनेवाले
तथा खर नामक दैत्यके शत्रु हैं ॥१॥ हे मुरारी ! यह संसाररूपी वन बड़ा ही
घोर, गम्भीर और सघन है । यह वन गहन कर्मरूपी वृक्षोंसे व्याप्त है। वासनाएँ
ही लताएँ हैं और (इच्छा पूर्ण न होनेके कारण उत्पन्न हुई) व्याकुलता ही
तीक्ष्ण काँटा-रूप है । मह कर्मरूपी वृक्षोंका वन बहुत बड़ा, कठिन तथा सघन