विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 129, कुल 475 में से
संदर्भ में पढ़ें११८ विनय-पत्रिका
हैं ॥७॥ हे आनन्दसिन्धो ! आप पाप-रहित, अद्वैत, दूषण-रहित, अव्यक्त,
अजन्मा, अमित तथा षट्विकार-रहित हैं। हे मेघनादको मारनेवाले लक्ष्मणजीके
भ्राता ! आप अचल, गृह-रहित, अविरल, रोगादि-रहित तथा अनादि हैं ॥८॥
सांसारिक दुःखोंसे खिन्न हुआ यह तुलसीदास शोकसे परिपूर्ण तथा अत्यन्त
भयभीत हो रहा है। हे प्रणत-पालक श्रीरामजी ! आप परम कारुणिक हैं। हे
पृथिवीनाथ ! मुझ दुर्विनीतकी रक्षा कीजिये ॥९॥
विशेष
१—'भूधरनधारी'—जिस समय देवराज इन्द्रने कुपित होकर ब्रजपर
मूसलधार वृष्टि की थी, उस समय भगवान् श्रीकृष्णने गो-गोपोंकी रक्षा करनेके
लिए गोवर्धन पर्वतको छत्रकी भाँति अँगुलीपर उठाकर उनकी रक्षा की थी।
तभीसे श्रीकृष्णका नाम गिरिधारी पड़ गया। गोस्वामीजीने श्रीरामको भूधरन-
धारी कहकर रामावतार और कृष्णावतारमें अभेद सिद्ध किया है।
( ५७ )
देव—
देहि सतसंग निज अंग श्रीरंग !
भव भंग कारन सरन-सोकहारी ।
ये तु भवदंघ्रिपल्लव-समाश्रित सदा,
भक्तिरत, विगतसंसय, मुरारी ॥१॥
असुर-सुर, नाग-नर, जच्छ-गन्धर्व खग,
रजनिचर, सिद्ध, ये चापि अन्ने ।
संत-संसर्ग त्रैवर्गपर परमपद,
प्राप्य निःप्राप्यगति त्वयि प्रसन्ने ॥२॥
वृत्र, बलि, बान, प्रह्लाद, मय, व्याध, गज,
गृद्ध, द्विजबन्धु, निजधर्म-त्यागी ।
साधुपद-सलिल निर्धूत-कलमष सकल,
श्वपच-जवनादि कैवल्य-भागी ॥३॥