विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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वरद, वनदाम, वागीस, विस्वात्मा,
विरज, वैकुंठ-मन्दिर-बिहारी ।
व्यापकं व्योम, वंदारु, वामन, विभो,
ब्रह्मविद् , ब्रह्म, चिंतापहारी ॥३॥
सहज सुंदर, सुमुख, सुमन, सुभ सर्वदा,
सुद्ध सर्वज्ञ, स्वच्छंदचारी ।
सर्वकृत, सर्वभृत, सर्वजित, सर्वहित,
सत्य-संकल्प, कल्पांतकारी ॥४॥
नित्य, निर्मोह, निर्गुन, निरंजन,
निजानंद निर्वान, निर्वानदाता ।
निर्भरानंद, निःकंप, निःसीम, निर्मुक्त,
निरुपाधि, निर्मम, विधाता ॥५॥
महामंगलमूल, मोद-महिमायतन,
मुग्ध-मधु-मथन, मानद, अमानी ।
मदनमर्दन, मदातीत, मायारहित,
मंजु मानाथ, पाथोज-पानी ॥६॥
कमल-लोचन, कलाकोस, कोदंडधर,
कोसलाधीस, कल्यानरासी ।
जातुधान-प्रचुर मत्तकरि-केसरी,
भक्तमन-पुन्य-आरन्यवासी ॥७॥
अनघ, अद्वैत, अनवद्य, अव्यक्त, अज,
अमित, अविकार आनंदसिंधो ।
अचल, अनिकेत, अविरल, अनामय,
अनारंभ, अंभोदनादहन-बंधो ॥८॥
दास तुलसी खेद खिन्न, आपन्न इह,
सोक-संपन्न, अतिसय सभीतं ।
प्रनत पालक राम, परम करुनाधाम,
पाहि मामुर्विपति, दुर्विनीतं ॥९॥