विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका ११३
सील-समता-भवन, विषमता-मति-समन,
राम रामारमन, रावनारी।
खङ्गकर, चर्मवर-वर्मधर, रुचिर कटि
तून सर-सक्ति सारंगधारी ॥२॥
सत्यसंधान, निर्वानप्रद, सर्वहित,
सर्वगुन-ज्ञान-विज्ञानसाली।
सघन-तम-घोर-संसार-भर-सर्वरी-
नाम दिवसेस खर-किरनमाली ॥३॥
तपन तीच्छन तरुन तीव्र तापघ्न, तप-
रूप, तनभूप, तमपर, तपस्वी।
मान-मद-मदन-मत्सर-मनोरथ-मथन,
मोह-अंभोधि-मंदर, मनस्वी ॥४॥
वेद-विख्यात, वरदेस, वामन, विरज,
विमल, वागीस, वैकुंठस्वामी।
काम-क्रोधादिमर्दन, विवर्धन, छमा,
सान्ति विग्रह, विहँगराज-गामी ॥५॥
परम पावन, पाप-पुंज-मुंजाटवी-
अनल इव निमिष निर्मूलकर्त्ता।
भुवन-भूषन, दूषनारि, भुवनेस, भू-
नाथ, स्रुतिमाथ जय भुवन-भर्त्ता ॥६॥
अमल, अविचल, अकल, सकल, संतप्त-कलि-
विकलता-भंजनानंदरासी।
उरग-नायक-सयन, तरुन पङ्कज-नयन,
छीरसागर-अयन, सर्ववासी ॥७॥
सिद्ध-कवि-कोविदानंद-दायक पद-
द्वंद्व मंदात्ममनुजैर्दुरापं।
यत्र संभूत अतिपूत जल सुरसरी
दर्शनादेव अपहरति पापं ॥८॥
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