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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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विनय-पत्रिका १०१
सकल यज्ञांसमय उग्र विग्रह क्रोड़,
मर्दि दनुजेस उद्धरन उर्वी ॥२॥
कमठ अति विकट तनु कठिन पृष्ठोपरी,
भ्रमत मंदर कंडु-सुख मुरारी।
प्रगटकृत अमृत, गो, इंदिरा, इंदु,
वृंदारकवृंद-आनंदकारी ॥३॥
मनुज-मुनि-सिद्ध-सुर-नाग-त्रासक, दुष्ट
दनुज द्विज-धर्म मरजाद-हर्ता।
अतुल मृगराज-वपुध्रित, विदरित अरि,
भक्त प्रहलाद-अहलाद-कर्ता ॥४॥
छलन बलि कपट-वटुरूप वामन ब्रह्म,
भुवन परजंत पद तीन करनं।
चरन-नख-नीर त्रैलोक-पावन परम,
विबुध-जननी दुसह-सोक हरनं ॥५॥
छत्रियाधीस-करि निकर-नर-केसरी,
परसुधर विप्र-ससि-जलद रूपं।
बीस भुजदंड दससीस खंडन चंड,
वेग सायक नौमि राम भूपं ॥६॥
भूमिभर-भार-हर, प्रगट परमात्मा,
ब्रह्म नर-रूपधर भक्त-हेतू।
वृष्णि-कुल-कुमुद-राकेस राधारमन,
कंस-वंसाटवी-धूमकेतू ॥७॥
प्रबल पाखंड महि-मंडलाकुल देखि,
निंदकृत अखिल मख कर्म-जालं।
सुद्ध वोधैक घन, ज्ञान-गुन-धाम, अज,
बौद्ध अवतार वंदे कृपालं ॥८॥