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सर्वकोश
वेणीसंहारम् (भट्ट नारायण - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

वेणीसंहारम् (भट्ट नारायण - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Venisamhara Nataka of Bhatta Narayana with Commentary

भट्ट नारायण द्वारा

DevanagariHindipublished355 पृष्ठ

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पृष्ठ 320

षष्ठोऽङ्कः ] प्रबोधिनी-प्रकाश-द्वयोपेतम् ३०१
युधिष्ठिरः—( अग्निं दृष्ट्वा, सहर्षम् । ) कृष्णे, ननूद्भूतशिखाहस्ताहूतास्म-
द्विधव्यसनिजनः समिद्धो भगवान्हुताशस्तत्रैन्धनीकरोम्यात्मानम् ।
द्रौपदी—पसीददु पसीददु महाराओ इमिणा अपच्छिमेण पणएण ।
अहं दाव अग्गदो पविसाभि । ( प्रसीदतु प्रसीदतु महाराजोऽनेनापश्चिमेन प्रणयेन ।
अहं तावदग्रतः प्रविशामि । )
युधिष्ठिरः—सहितावेवाभ्युदयमुपभोक्ष्यावहे ।
चेटी—हा भअवन्तो लोअवाला, परित्ताअह परित्ताअह । एसो क्खु
सोमवंसराएसी राअसूअसंतप्पिदहव्ववाहोखण्डवसंपिदहुदवहस्स किरि-
डिणो जेट्ठो भा सुग्गहीहणामहेओ महाराअजुहिट्ठिरो । एसा वि पाञ्चाल-
राअतणआ देवी वेदिमज्जसंभवा जणसेणी । दुवे वि णिक्करुणजलणस्स-
प्पवेसेन इन्धणीहोन्ति । तापरित्ताअह अज्जा, परित्ताअह । कधं ण को वि
परित्ताअदि । (तयोरग्रतः पतित्वा ।) किंन वसिदं देवीए देवेण अ । (हा भगवन्तो
अग्निमिविति—चितास्थमिति भावः । उद्भूतशिखाहस्ताहूतास्मद्विधव्यसनिजनः=
उद्भूता प्रकम्पिता चञ्चला वा या शिखा ज्वाला सैव हस्तः करः तेन आहूताः
आकारिताः अस्मद्विधाः व्यसनिजनाः पीडितशक्तयः येन सः, 'हूतिराकारणाह्वानम्'
इत्यमरः । हुताशनः = अग्निः, इन्धनीकरोमि = अनिन्धनम्, इन्धनं सम्पद्यते तत्क-
रोमि 'कृभ्वस्तियोगे' इत्यादिना च्विप्रत्ययः । 'अस्य च्वौ' इतीत्वं च्वेलोपः ।
अपश्चिमेन = अनन्त्येन अग्रतः = अग्रे, भवतः पूर्वमित्यर्थः ।
अभ्युदयं = प्रियप्राप्तिरूपोत्सवम् ।
युधिष्ठिर—(अग्नि को देखकर प्रसन्नता के साथ) कृष्णे ! अपने अखण्ड ज्वाला रूप
हाथ से हम लोगों जैसे दुखियों का आह्वान करते हुए भगवान् अग्निदेव प्रदीप्त हो रहे हैं ।
मैं उनमें अपने को ईंधन की तरह झोंक दूँगा ।
द्रौपदी—प्रसन्न हों प्रसन्न हों महाराज ! अपनी इस प्राथमिक अभ्यर्थना से मैं सर्व-
प्रथम अपने को आहुति करूँगी ।
युधिष्ठिर—यदि इसी तरह की समस्या है तो हम दोनों एक ही साथ अभ्युदय का
उपयोग करें । अर्थात् जलकर इस दुःख से मुक्त हो जाँय ।
चेटी—हाय लोकपालों ! आपलोग रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए । यह चन्द्रवंश के
राजर्षि राजसूययज्ञ के विधान से अग्निदेव को तृप्त करने वाले, खाण्डववन के दहनकर्त्ता
अर्जुन के ज्येष्ठ भ्राता हैं । इनका शुभ नाम युधिष्ठिर है । पाञ्चाल नरेश की पुत्री