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सर्वकोश
वेणीसंहारम् (भट्ट नारायण - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

वेणीसंहारम् (भट्ट नारायण - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Venisamhara Nataka of Bhatta Narayana with Commentary

भट्ट नारायण द्वारा

DevanagariHindipublished355 पृष्ठ

पृष्ठ 215, कुल 355 में से

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पृष्ठ 215

[चतुर्थोऽङ्कः ] प्रबोधिनी-प्रकाश-द्वयोपेतम् १९५
संत्यक्ष्यावो हततनुमिमां दुःखितौ निर्वृतौ च ॥ १३ ॥
अथवा शोकं प्रति मया न किञ्चित्सन्देष्टव्यम् ।
वृषसेनो न ते पुत्रो न मे दुःशासनोऽनुजः ।
त्वां बोधयामि किमंहं त्वं मां संस्थापयिष्यसि ॥ १४ ॥
सुन्दरकः—जं देवो आणवेदि [ इति निष्क्रान्तः ] ( यद्देव आज्ञापयति । )
दुर्योधनः—तूर्णमेव रथमुपस्थापय ।
सूतः—( कर्णं दत्त्वा । ) देव, ह्रेपासंबलितो नेमिध्वनिः श्रूयते । तथा
तर्कयामि नूनं परिजनोपनीतो रथः ।
मृतप्रायशरीरम् सन्त्यक्ष्यावः=हास्यावः, यावामिति शेषः । मन्दाक्रान्ता छन्दः ॥१३॥
अथेति शोकविषयकसन्देशो न प्रेषितव्य इत्यर्थः । तस्य स्वयमेवागतत्वादित्याशयः ।
अन्वयः - ते, वृषसेनः, पुत्र, न, किम् मे, दुःशासनः, अनुजः, न ( किम् )
अहम् त्वया, किम्, बोधयामि, त्वम्, माम्, किम्, संस्थापयिष्यसि ॥ १४ ॥
वृषसेन इति । ते = तव, वृषसेनः = त्वत्पुत्रः पुत्रः, 'न, किमिति शेषः पुत्र
एवेति भावः । मे = मम दुशासनः, अनुजः = कनिष्ठभ्राता, न, अनुज एवेति भावः ।
त्वां = कर्णम्, किम् बोधयामि = आश्वासयामि, न किमपीत्यर्थः त्वं = कर्णः, माम्,
किम्, संस्थापयिष्यसि = धैर्यं धारयिष्यसि, तथा चावां मिलित्वैव शत्रुविजयं करि-
ष्यावः अत एव कथयिष्यति = तूर्णमेव रथमुपस्थापयेति अनुष्टुप् छन्दः ॥ १४ ॥
ह्रेपासंबलितः=अश्वशब्दयुक्तः, नेमिध्वनिः-चक्रप्रान्तशब्दः श्रूयते, तर्कयामि=
दूसरे के साथ प्रेमालिङ्गन करके इस शरीर को त्याग करेंगे क्योंकि इसका कोई ठिकाना
नहीं है । हम लोगों का कार्य भी इस तरह पूरा हो जाता है ॥ १३ ॥
अथवा शोकग्रस्त के प्रति मुझे कुछ भी संदेश नहीं भेजना है ?
तुम्हारा पुत्र क्या वृषसेन नहीं है ? और मेरा क्या कनिष्ठ भ्राता दुःशासन नहीं है ?
मैं तुम्हें क्या धैर्यप्रदान करूँ और तुम मुझे क्या सान्त्वना दोगे ?
अथवा—वृषसेन तुम्हारा ही पुत्र नहीं था मेरा भी पुत्र था । दुःशासन मेरा ही भाई
नहीं था किन्तु आपका भी भाई था दोनों का दुःख बराबर है अतः मैं क्या तुम्हें समझाऊँ
और तुम मुझे क्या समझाओगे ? ॥ १४ ॥
सुन्दरक—अच्छा, जो महाराज की आज्ञा ( चल पड़ता है )
दुर्योधन—शीघ्र ही रथ उपस्थित करो ।
सूत—( कान लगाकर ) महाराज ! हिनहिनाहट के साथ रथचक्र की ध्वनि सुनाई
पड़ रही है अतः अनुमान करता हूँ कि अवश्य भृत्यों ने रथ को लाया होगा ।