वेणीसंहारम् (भट्ट नारायण - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Venisamhara Nataka of Bhatta Narayana with Commentary
भट्ट नारायण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थोऽङ्कः ] प्रबोधिनी-प्रकाशद्वयोपेतम् १५७
नायमाचरिष्यति । ( त्वरितं परिक्रम्यावलोक्य च । ) अये ! अयमसौ सर-
सीसरोजविलोलनसुरभिशीतलमातरिश्वसंवाहितसान्द्रकिसलयो न्यग्रोधपा-
दपः । उचिता विश्रामभूरियं समरव्यापारखिन्नस्य वीरजनस्य । अत्र
स्थितश्चायाचिततालवृन्तेन हरिचन्दनच्छटाशीतलेनाप्रयत्नसुरभिणा दशा-
परिणामयोग्येन सरसीसमीरेणामुना गतक्लमो भविष्यति महाराजः ।
लूनकेतुश्चायं रथोऽनिवारित एव प्रवेक्ष्यति छायामिति । (प्रवेशं रूपयित्वा ।)
कः कोऽत्र भोः । ( समन्तादवलोक्य । ) कथं न कश्चिदत्र परिजनः । नूनं
तथाविधस्य वृकोदरस्य दर्शनादेवंविधस्य च स्वामिनस्त्रासेन शिबिरसन्नि-
अनार्यम् = अनुचितम् । सरसीसरोजविलोलसुरभिशीतलमातरिश्वसंवाहितसान्द्र-
किसलयः = सरसीनां सरोजानाञ्च विलोलनेन सञ्चालनेन शीतलः सुरभिः सुग-
न्धिश्च यो मातरिश्वा वायुः तेन संवाहितम् संचालितं किसलयं पल्लवः यस्मिन्,.
सः, न्यग्रोधपादपः = वटवृक्षः अस्तीति शेषः । समरव्यापारखिन्नस्य = सङ्ग्राम-
करणेन श्रान्तस्य, विश्रामभूः = श्रमनिवारणस्थानम्, इयम्, उचिता = योग्या ।
अयाचिततालवृन्तेन = स्वयं प्राप्तव्यजनेन, हरिचन्दनच्छटाशीतलेन = श्रीखण्डशीत-
लेन, अप्रयत्नसुरभिणा = अनायासोत्तमगन्धवता, दशापरिणामयोग्येन = मूर्च्छानिवा-
रणसमर्थेन, सरसीसमीरेण = सरोवरस्यवायुना, अमुना = उपस्थितेन, गतक्लमः =
विरतग्लानिः श्रमरहितः । लूनकेतुः = छिन्नध्वजः, अनिवारितः अनवरुद्धः स्वयमेवे-
त्यर्थः । प्रवेक्ष्यति = प्रवेशं करिष्यति । परिजनः ।
दुःशासन की तरह इन पर भी यह नीच नीचता कर जाय (शीघ्र ही घूमकर और देखकर)
अहा ! यह एक वटवृक्ष (बड़ का पेड़) हैं । सरोवर के कमलों का प्रकम्पन करने के कारण
शीतल और सुगन्ध पूर्ण वायु के झकोरों से इसकी घनी और सुकोमल पत्तियाँ मन्द-मन्द
हिल रही हैं । समराङ्गण में युद्ध करते-करते श्रान्त वीरपुरुष के विश्राम करने योग्य यह
सुन्दर भूमि है। यहाँ रहकर बिना किसी आयास के तालपत्रों के उपवीज ( पंखा ) द्वारा
तथा हरिचन्दन के वृक्षों की शीतलता से और अप्रयत्नलभ्य सुगन्ध से तथा भाग्यवश
सरोवरों के इस सुखकर वायु के सेवन से महाराज की खिन्नता दूर हो जायगी । (ऊपर की
ओर देखकर) रथ की पताका भी कट कर गिर गई है अतः यह (रथ) बिना किसी अवरोध
के छाया में चला जायगा । ( छाया में रथ ले जाने का अभिनय करता है ) कोई है ?
[ महाराज के छत्र-चामर और पंखों को शीघ्र उपस्थित करो ] । (चारों ओर देखकर) क्यों
क्या कारण है यहाँ कोई अनुचर नहीं है ? निश्चय भीम को उस भीषण वेश में देख और
महाराज की भी यह दशा देखकर सभी नौकर-चाकर डर गये हैं और पड़ाव पर तम्बुओं