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सर्वकोश
वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara by Sadananda Yogindra

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished145 पृष्ठ

पृष्ठ 77, कुल 145 में से

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पृष्ठ 77

संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेत । ( ७७ )
चैतन्ययोराधारभूतं यदनुपहितं चैतन्यं तत्ताभ्यां विविक्तं
सद्भेदाविवक्षया तत्पदलक्ष्यार्थो भवतीत्यर्थः ॥ ७३ ॥
( भा० टी० ) भ्रमके नष्ट होनेपर जिसप्रकार यह सम्पूर्ण
प्रपञ्च अपने २ कारणमें लीन होकर ब्रह्मरूपमें अवस्थित
होता है सो दिखाते हैं । - “स्थूलभोगका स्थानस्वरूप चार
प्रकारका स्थूलशरीर और भोग्य अन्नपानादि इन सबके आ-
धारस्वरूप भूलोकको आदिले चौदह लोक और इन्हीं सबके
वर्त्तमान स्थानस्वरूप ब्रह्माण्ड यह सम्पूर्ण पञ्चीकृत पञ्चमहा-
भूत मात्र है । शब्द स्पर्शादि विषयों सहित यह संपूर्ण पञ्ची-
कृत पञ्चभूत और सूक्ष्मशरीर यह सब अपने अपने कारण
रूप अपञ्चीकृत पञ्चमहाभूतमात्र हैं सत्त्व आदि गुणयुक्त यह
सम्पूर्ण अपञ्चीकृत पञ्चमहाभूत उत्पत्तिके उलटे क्रमसे अर्था-
त् पृथिवी जलसे जल अग्निसे अग्नि वायुसे वायु आकाशसे
और आकाश अज्ञानसे इसप्रकार कारणरूप अज्ञानोपहित
कारणरूप चैतन्य मात्र है । यही अज्ञान और अज्ञानोपहित
चैतन्यरूप ईश्वरको आदिले सबही उसके आधारभूत अनु-
पहित चैतन्यरूप तुरीय ब्रह्म है पूर्वोक्त अध्यारोप और अप-
वादमें कहीहुई रीति के द्वारा “तत्” और “त्वम्” इन दोनों
पदार्थोंका शोधन( सङ्गति ) ठीक होती है अज्ञानादिकी सम-
ष्टि अर्थात् अज्ञान, सूक्ष्मशरीर और स्थूलशरीरकी समष्टि
तदुपहित चैतन्य अर्थात् ईश्वर, हिरण्यगर्भ और विराट्र चै-
तन्य, और अनुपहित चैतन्य, तुरीय ब्रह्म चैतन्य, यह तीन