वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara by Sadananda Yogindra
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसंस्कृतटीका-भाषाटीकासमेत। ( ७ )
दिष्टं तथापि परमानुबंधचतुष्टयस्यानिरूपितत्वादत्र प्रेक्षावतां
प्रवृत्तिर्न स्यादित्यत आह । अस्येति । अस्य वेदान्तसा-
रस्येत्यर्थः ॥ ४ ॥
( भा० टी० ) यह ग्रन्थ वेदान्तशास्त्रके अन्तर्गत है इ-
सकारण वेदान्तशास्त्रके अन्य ग्रन्थोंके पढ़नेसे जो फल हो-
ताहै वही फल इस वेदान्तसारके पढ़नेसेभी होताहै इसी
कारण वेदान्तके अन्य ग्रन्थोंमें जो चार अनुबन्ध ( अधि-
कारी, विषय, सम्बन्ध, प्रयोजन, ) कहेहैं उनही चार अनु-
बन्धोंके द्वारा इस ग्रन्थकी अनुबन्धकार्य्यसिद्धि होजातीहै
इसकारण इस ग्रन्थमें अन्य अनुबन्धोंके विचारका कोई
प्रयोजन नहींहैं ॥ ४ ॥
तत्रानुबन्धो नाम अधिकारिवि-
षयसम्बन्धप्रयोजनानि ॥ ५ ॥
( सं० टी० ) ननु वेदान्तशास्त्रस्यापि किमनुबंधचतुष्टयं
येनास्यापि तद्गतासिद्धिरित्याशङ्क्य मूलशास्त्रस्यानुबंधचतु-
ष्टयमाविष्करोति ॥ तत्रेति ॥ ५ ॥
( भा०टी० ) अधिकारी, विषय, सम्बन्ध, प्रयोजन, इ-
सीको वेदान्तमें अनुबन्धचतुष्टय कहते हैं । इन्हीं चार अ-
नुबन्धोंको लेकर वेदान्तशास्त्र प्रवृत्त होताहै ॥ ५ ॥
अधिकारी तु विधिवदधीतवेदवेदाङ्गत्वे
नापाततो ऽधिगताखिलवेदार्थो ऽस्मिन्
जन्मनि जन्मान्तरे वा काम्यनिषिद्धवर्ज-