वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara by Sadananda Yogindra
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 66, कुल 145 में से
संदर्भ में पढ़ें( ६६ ) वेदान्तसार ।
मैं बधिर हूँ' इसप्रकार ज्ञान सबको होता है इससे इन्द्रिय
गणही आत्मा है” ॥ ६३ ॥
अपरश्चार्वाकः“अन्योऽन्तर आत्मा प्राणमयः” इ-
त्यादिश्रुतेः प्राणाभावे इन्द्रियचलनायोगात् अह-
मशनायावानहं पिपासावान् इत्याद्यनुभवाच्च प्राण
आत्मेति वदति । अन्यस्तु चार्वाकः “अन्योन्तर
आत्मा मनोमयः” इत्यादिश्रुतेः मनसि सुप्ते प्राणा-
देरभावात् अहं सङ्कल्पवानहं विकल्पवानित्याद्य-
नुभवाच्च मन आत्मेति वदति ॥ ६४ ॥
( सं०टी० ) ततोप्युत्तमोऽधिकारी कश्चिच्छुतिप्रमाणा-
नुभवयुक्तिबलात् प्राण एवात्मेत्याह । अपर इति । ततो
विशिष्टोधिकारी कश्चित्स्वमताानुकूलश्रुत्यादिबलान्मन एवा-
त्मेत्याह । अन्यस्त्विति ॥ ६४ ॥
( भा०टी० ) कोई कोई चार्वाकमतावलम्बी प्राणको
आत्मा कहते हैं और इस श्रुतिका प्रमाण देते हैं-“प्राणमय
अन्तरात्मा शरीरादिसे भिन्न है।” और मतके स्थापनके अर्थ
ऐसी युक्ति देते हैंकि-। “जिस समय शरीरमें प्राण नहीं रहता है
तब इन्द्रियोंके समूहसे कोई क्रिया नहीं होसक्ति है । इससे
प्राणही आत्मा है” और यह युक्ति दिखाते हैं- “मैं क्षुधार्त्त हूँ,
पिपासातुर हूँ' इसप्रकार आपण्डितपामरपर्य्यन्तको अनुभव
होता है इसकारण प्राणही आत्मा है”। कोई कोई चार्वाक
मतावलम्बी मनको आत्मा कहते हैं और इस श्रुतिका प्रमाण