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वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara by Sadananda Yogindra

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished145 पृष्ठ

पृष्ठ 54, कुल 145 में से

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पृष्ठ 54

( ५४ ) वेदान्तसार ।
तीय अर्द्धको छोड़कर और चार भूतके द्वितीयार्द्ध भागके
सहित मिलानेको पंचीकरण कहते हैं । इस विषयके प्रमाण
स्वरूप अन्यान्य ग्रन्थोंमेंभी लिखा है—“पञ्चभूतके प्रत्येकके
समान दो भाग करै फिर उसी पञ्चभूतके प्रत्येक प्रथम भाग
के चार भाग करै द्वितीय पञ्चभूतके प्रत्येक प्रथम अंशमें प्र-
त्येक चार भागके मिलानेको पञ्चीकरण कहतेहैं” ॥ ५२ ॥
अस्याप्रामाण्यं नाशङ्कनीयं त्रिवृत्करणश्रु
तेः पंचीकरणस्याप्युपलक्षणार्थत्वात् ।
पंचानां पंचात्मकत्वे समानेऽपि “तेषु च
वैशिष्ट्यात्तु तद्वादस्तद्वादः” इति न्यायेन
आकाशादिव्यपदेशः संभवति ॥ ५३ ॥
(सं०टी०) पंचीकरणस्य त्रिवृत्करणप्रतिपादकश्रुत्यं-
तरविरोधमाशंक्य परिहरति । अस्याप्रामाण्यमिति। भूत-
त्रयसृष्टिश्रुतौ सृष्टिपरिपूर्णार्थमन्यत्र श्रुतमपि भूतद्वयमाश्रित्य
भूतपंचकाभिप्रायेण भूतत्रयसृष्टिप्रतिपादनादविरोध इत्यर्थः ।
आकाशादीनां पंचभूतानां चतुर्धा विभक्तानामन्योन्यं प्रत्येका-
नुप्रवेशेन पंचीकृतानां पंचात्मकत्वाविशेषादाकाशादिव्यपदे-
शो न स्यादित्याशंक्य परिहरति । पंचानामिति । आकाशा-
दीनां पंचानां पंचात्मकत्वे समानेपि तेषु पंचभूतेषु तत्तद्वि-
शेषानुप्रवेशात्तन्नामभिर्व्यवहारः संभवतीत्यर्थः ॥ ५३ ॥
(भा०टी०) कहेहुए पञ्चीकरणके प्रमाणविषयकी
शङ्का नहीं करनी क्योंकि त्रिवृत्करणकी श्रुतिसे पञ्चीकरण-