सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara by Sadananda Yogindra

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished145 पृष्ठ

पृष्ठ 31, कुल 145 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 31

संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेत । ( ३१ )
योपाध्यवच्छिन्नाकाशवत् जलगतप्रतिबिंबाकाशवच्चकारणो
पाध्यवच्छिन्नैश्वरस्य कार्योपाध्यवच्छिन्नप्राज्ञस्य च वस्तुतोऽ
भेद एवेत्यर्थः।तत्र प्रमाणमाह।एष इति । तथा चोक्तमाचार्यैः ।
“कार्योपाधिरयं जीवःकारणोपाधिरीश्वरःकार्यकारणतांहित्वा
पूर्णबोधोऽवशिष्यते” इति ॥ ३२ ॥
( भा०टी० ) जिसप्रकार वृक्षोंके समष्टिरूप वनमें अव-
स्थित आकाश सहित वनका और व्यष्टिरूप प्रत्येक वृक्षमें
अवस्थित आकाशका कोई भेद प्रतीत नहीं होता है तथा
जलके समष्टिरूप जलाशयमें प्रतिबिम्बित आकाशसहित ज-
लाशयका और व्यष्टिरूप जलमें प्रतिबिम्बित आकाशका
कोई भेद नहीं मालूम होता है। इसी प्रकार समष्टिरूप अज्ञान-
उपाधि विशिष्टचैतन्यस्वरूप ईश्वरका और व्यष्टिरूप अज्ञा-
नसे उपहित चैतन्यस्वरूप प्राज्ञका कोई भेद नहीं है इस वि-
षयमें श्रुतिका भी प्रमाण है—“यही सम्पूर्णका ईश्वर, यही स-
र्वज्ञ, यही अन्तर्यामी, यही सम्पूर्णका कारण, यही जगत्की
उत्पत्ति और प्रलयका हेतु है” ॥ ३२ ॥
वनवृक्षतदवच्छिन्नाकाशयोर्जलजलाशयतद्गतप्रति
बिम्बाकाशयोर्वा आधारभूतानुपहिताकाशवदन-
योरज्ञानतदुपहितचैतन्ययोराधारभूतं यदनुपहि-
तं चैतन्यं तत्तूरीयमित्युच्यते । “शान्तंशिवमद्वैतं
चतुर्थ मन्यन्ते स आत्मा सविज्ञेयः ,, इत्यादि
श्रुतेः ॥ ३३ ॥