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सर्वकोश
वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara by Sadananda Yogindra

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished145 पृष्ठ

पृष्ठ 2, कुल 145 में से

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श्रीः ।
प्रस्तावना.
समस्त आत्मतत्त्वजिज्ञासु महाशयोंको विदित करनेमें आताहै कि,
इस संसारका मूलतत्त्व क्या है ? यह जाननेके लिये अध्यात्मशास्त्रसे
अधिक बढकर कोई शास्त्र नहीं है. इस अध्यात्मशास्त्रके आचार्योंके
भेदसे अनेक भेद हुए हैं. परंतु उन भेदभिन्न भेदवादियोंके अनेक म-
तोंसे मूल अद्वैत वेदांतसिद्धांत सबतरह अतिश्रेष्ठ है. जो कि अना-
दिकालसे अव्याहत चला आताहै. और वेदमूलक सिद्धान्तानुसारी
महात्माओंने इसकीही प्रशंसा करीहुई देखीजाती है. जिसका मूल
“नेह नानास्ति किंचन” “एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म” इत्यादिश्रुतियां हैं.
इस अद्वैत वेदांतसिद्धांतके प्रतिपादक अनेक २ ग्रंथ आजतक
छपकर जगह २ प्रसिद्ध हुए हैं. इन अनेक ग्रंथोंमें सब सिद्धांत बड़े
विस्तारके साथ निरूपण कियेगए हैं. जिससे ज्ञान होनेके वास्ते
बहुत परिश्रम करना पड़ता है. इसवास्ते परमहंसपरिव्राजकाचार्य
सदानन्दयोगींद्रजीने “वेदांतसार” नामक ग्रंथ बनाया है. इस ग्रंथके
ऊपर पं० श्रीनृसिंहसरस्वतीजीने बहुतही सरल संस्कृत टीका बनाई है-
अब इस ग्रंथका सर्व साधारण और विना संस्कृत पढेहुए लोगोंको
ज्ञान होनेके वास्ते हमने श्रीक्षेत्र काशीनिवासि पंडित “रामस्वरूप”
जीसे सरल हिंदीभाषामें स्वरूपप्रकाश नामक टीका बनवाकर हमारे
सुप्रसिद्ध “श्रीवेङ्कटेश्वर” छापाखानेमें छापकर प्रसिद्ध किया है.
अब हम आशा रखते हैं कि,-वेदांतशास्त्रके जिज्ञासु महाशय
गण इस अत्यंत उपयोगी पुस्तकका अवश्य संग्रह करेंगे.
खेमराज श्रीकृष्णदास.
“श्रीवेङ्कटेश्वर” छापाखाना. (मुंबई.)