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सर्वकोश
वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara by Sadananda Yogindra

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished145 पृष्ठ

पृष्ठ 128, कुल 145 में से

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पृष्ठ 128

( १२८ ) वेदान्तसार ।
होनेपरभी बधिरकेसा व्यवहार करता है, मन होनेपरभी म-
नोहीनकेसा व्यवहार करता है, और प्राण होनेपरभी प्राणर-
हितकेसा व्यवहार करता है।” और जगहभी कहा है-“जा-
ग्रत् अवस्थामें सुषुप्तिकी तरह बाह्य वस्तुमें व्यवहार करता
है जो द्वैत वस्तुकोभी अद्वैत बोले है और जो कर्म करता
हुआभी अन्तःकरणको निष्क्रिय माने है वह ब्रह्मपरायण पु-
रुष निश्चय करके जीवन्मुक्त है। उससे अन्यको जीवन्मुक्त
नहीं कहेहैं ॥ ९७ ॥
अस्य ज्ञानात्पूर्व विद्यमानानामेवाहारविहारादी-
नां अनुवृत्तिवच्छुभवासनानामेवानुवृत्तिर्भवति
शुभाशुभयोरौदासीन्यं वा। तदुक्तम्-“बुद्धाद्वैतम-
तत्त्वस्य यथेष्टाचरणं यदि । शुनां तत्त्वदृशां चैव
को भेदोऽशुचिभक्षणे । ब्रह्मवित्त्वं तथा मुक्त्वा स-
आत्मज्ञो न चेतरः”इति ॥ ९८ ॥
(सं०टी०) नन्वस्य जीवन्मुक्तस्य योगीश्वरस्य मम पु-
ण्यं पापं च नास्तीत्यभिमानवशायथेष्टाचरणप्रसंगमाशंक्य
परिहरति॥ अस्येति। अस्य पूर्वोक्तजीवन्मुक्तस्य ज्ञानात्प्रागे-
व शांत्यादिगुणैरशुभवासनाया निवारितत्वात्संसारदशायाम-
प्रयत्नेनाहारादिप्रवृत्तिवत् तत्त्वज्ञानोत्तरमपि शुभानामेव वास-
नानामनुवृत्तिर्भवति नाशुभानामित्यर्थः । ननु शुभवासनानुवृ-
त्तेरपि प्रयोजनाभावात्किं तदनुवृत्त्येत्यत आहाशुभाशुभयोरि-