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वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara by Sadananda Yogindra

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished145 पृष्ठ

पृष्ठ 101, कुल 145 में से

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पृष्ठ 101

संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेत । ( १०१ )
त्तिरावरणनिवृत्त्यर्थमज्ञानावच्छिन्नं चैतन्यं व्याप्नोतीत्येतद्वृ-
त्तिव्याप्यत्वमंगीक्रियते आवरणभंगानंतरंस्वयं प्रकाशमानं चै-
तन्यं फलचैतन्यमित्युच्यते तस्मिन्फलचैतन्ये निष्फल का-
चिद्वृत्तिर्न व्याप्नोति आवरणभंगस्य प्रागेव ज्ञातत्वेन प्रयोज-
नाभावादित्यर्थः । अस्मिन् ग्रन्थे ग्रंथांतरं संवादयति । तदु-
क्तमिति । वृत्तिप्रतिबिंबितचैतन्याभासस्यापि फलचैतन्य-
प्रकाशकत्वं नेत्यत्रापि संमतिमाह । स्वयमिति ॥ ८७ ॥
(भा०टी०) पूर्वोक्त अनुभव प्रकार सिद्ध होनेपर “ब्र-
ह्म मन करके धारण किया जाता है । ब्रह्म मनसे धारण
नहीं किया जाताहै । ” इन परस्पर विरुद्ध दोनों श्रुतियोंका
विरोध भी दूर होगया । क्योंकि मनोवृत्तिद्वारा ब्रह्म विषयक
अज्ञानका नाश होताहै किन्तु अन्तःकरणवृत्तिमें प्रतिबिं-
म्बित चैतन्य परब्रह्मका प्रकाश नहीं करसक्ता । इस विषय
में प्रमाण भी है शास्त्रकारोंने अन्तःकरणप्रतिबिम्बित चैतन्य-
के द्वारा परब्रह्म चैतन्यके प्रकाशके निषेध पूर्वक अन्तःकरण-
वृत्तिके द्वारा तद्विषयक अज्ञानका नाश होना स्वीकार कि-
याहै क्योंकि परम ब्रह्म स्वप्रकाश स्वरूप है । इसी कारण उ-
सका प्रकाश दूसरेका कराहुआ नहीं होसक्ता है ॥ ८७ ॥
जडपदार्थाकाराकारितचित्तवृत्तेर्विशेषोऽस्ति । त-
थाहि अयं घट इति घटाकाराकारितचित्तवृत्तिर-
ज्ञातं घटं विषयीकृत्य तद्गताज्ञातनिरसनपुरःसरं
स्वगतचिदाभासेन जलमपि घटं भासयति । त-