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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

पृष्ठ 99, कुल 314 में से

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पृष्ठ 99

भूमिका ८५


(3) पारमार्थिक सत्ता। ये तीनों वेदान्त की सृष्टिप्रक्रिया को समझने में
सहायक हैं। अतः हम यहाँ इनका संक्षिप्तपरिचय प्रस्तुत कर रहे हैं-
(क) प्रातिभासिक सत्ता-उसे कहते हैं जो प्रतीति के समय तो सत्य
प्रतीत होती है, किन्तु कुछ समय के बाद किसी अन्य ज्ञान द्वारा बाधित हो
जाती है। जैसे-रस्सी में साँप की प्रतीति। अनेकबार मार्ग में पड़ी हुई रस्सी
को हम अन्धकार आदि के कारण सर्प समझ लेते हैं, किन्तु अगले ही क्षण
प्रकाश आदि होने से रस्सी की यथार्थसत्ता का ज्ञान होता है। अतः अन्धकार
आदि के कारण भ्रान्तिवश रस्सी में जो सर्पज्ञान था, वह यथार्थस्थिति
(रज्जु) का ज्ञान होने पर बाधित हो जाता है। इसलिए किसी पदार्थ में
अन्यपदार्थ की काल्पनिकसत्ता बाधित होने से पूर्व जितने समय तक
विद्यमान रहती है। उसे वेदान्तदर्शन ने प्रतिभासिकसत्ता कहा है। यह प्रतीति
वस्तुतः अज्ञानादि के कारण कल्पित होती है, जो उत्तरकाल में यथार्थज्ञान
के साथ समाप्त हो जाती है। वेदान्त की दृष्टि में सीपी में चाँदी की प्रतीति
भी वस्तुतः ऐसी ही 'प्रतिभासिक सत्ता' है। जो यथार्थज्ञान के साथ स्वतः
समाप्त हो जाती है।
(ख) व्यावहारिक सत्ता-इसके अन्तर्गत इसप्रकार के विषय आते हैं
जो व्यवहार के समय सत् प्रतीत होते हैं। प्रत्यक्षरूप से देखने पर उनकी
सत्ता को नकारा नहीं जा सकता, किन्तु ब्रह्मज्ञान की स्थिति में इसका बाध
हो जाता है। शङ्कराचार्य के अनुसार-यह जगत् एकान्ततः सत्य न होकर
केवल व्यवहारकाल में सत्य होता है (ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्य-2/1/14)। अतः
इसे व्यावहारिक सत्ता वाला कहा जाएगा। संसार के घट-पट आदि सभी
पदार्थ दूसरे शब्दों में सम्पूर्णजगत् इसका उदाहरण है। प्रातिभासिक सत्ता की
अपेक्षा इसका अस्तित्व अधिक लम्बे समय तक बना रहता है। अतः
अधिक स्थायी है, किन्तु इसे पूर्णतया सत्य नहीं कहा जा सकता। ब्रह्मज्ञान
होने पर सम्पूर्ण संसार एवं उसमें स्थित सभी पदार्थों का मिथ्यात्व
स्वतःसिद्ध हो जाता है।
(ग) पारमार्थिक सत्ता-वेदान्तदर्शन के अनुसार यह पूर्णतया सत्य और
शाश्वत है। भूत, भविष्य एवं वर्तमान तीनों कालों में इसका अस्तित्व
विद्यमान रहता है। यह भौतिकपदार्थों की सत्ता से विलक्षण है। संसार के
घट-पट आदि पदार्थ आज हैं कल नहीं रहेंगे, अतः अनित्य हैं। इसीलिए
उनकी सत्ता व्यावहारिक कही गई है, पारमार्थिक नहीं। इसके विपरीत