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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

पृष्ठ 87, कुल 314 में से

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पृष्ठ 87

भूमिका ७३
पारमार्थिक सत्तावान् है, शेष सम्पूर्णजगत् भ्रान्तिभासिकसत्तावान् होने से
अनित्य एवं मिथ्या है (ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या)। साथ ही वेदान्तदर्शन
व्यावहारिकदृष्टि से सभी सांसारिकवस्तुओं के अस्तित्व को स्वीकार करता
है। अतः उन सभी की सिद्धि के लिए यहां भी अन्य दर्शनों के समान
प्रमाणों को स्वीकार किया गया है। यहाँ इनकी संख्या छः रही है- प्रत्यक्ष,
अनुमान, उपमान, शब्द, अर्थापत्ति एवं अभावप्रमाण। अब हम इनका क्रमशः
वर्णन करेंगे-
(i) प्रत्यक्ष- यथार्थज्ञान का कारण प्रत्यक्षप्रमाण को माना गया है।
दूसरे शब्दों में इसे प्रत्यक्षरूप से होने वाला यथार्थ-अनुभव भी कहा जा
सकता है। यह अनुभव वस्तु के ज्ञानेन्द्रियों के साथ सम्पर्क के
परिणामस्वरूप होता है। घट-पट आदि कोई वस्तु जब नेत्र आदि इन्द्रिय के
सम्पर्क में आती है तो मन एवं बुद्धिरूप अन्तरिन्द्रिय उस वस्तु तक पहुँचते
हैं तथा वे उस वस्तु के आकार से आकारित हो जाते हैं। इस स्थिति में
व्यक्ति को निश्चयात्मिकाबुद्धि द्वारा उसके घट (घड़ा) अथवा पट
(कपड़ा) होने का यथार्थज्ञान होता है। इस प्रत्यक्षप्रक्रिया में वस्तु का इन्द्रिय
के साथ सम्पर्क होना अत्यावश्यक है। जिसके परिणामस्वरूप 'चित्'
आभास से आभासित अन्तःकरणवृत्ति अपने वस्तुविषयक अज्ञान को विनष्ट
कर देती है और हमें वस्तु का यथार्थप्रत्यक्ष (ज्ञान) होता है।
वेदान्तदर्शन के अनुसार यह प्रत्यक्ष ठीक वैसा ही होता है, जैसा कि
किसी दीपक का प्रकाश वहाँ फैले अन्धकार को अपने प्रभाव से विनष्ट भी
करता है तथा वहाँ स्थित घट आदि वस्तुओं को प्रकाशित भी करता है।
इस सम्पूर्ण व्यापार में चिद्वृत्ति अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निर्वाह करती है।
जिसे पञ्चदशीकार ने इसप्रकार प्रतिपादित किया है-
“बुद्धितत्स्थाचिदाभासो द्वावेतौ व्याप्नुतो घटम्।
तत्राज्ञानं धिया पश्येदाभासेन घटः स्फुरेत्॥”
वस्तुओं का यह प्रत्यक्ष निर्विकल्पक एवं सविकल्पकभेद से दो प्रकार
का होता है। (तच्च प्रत्यक्षं द्विविधं, सविकल्पकनिर्विकल्पकभेदात्)। वस्तु के
नाम, रूप, जाति, योजना आदि से रहित ज्ञान निर्विकल्पक होता है। जो
वस्तु के प्रथमज्ञान के समय होता है। तदनन्तर उसके नाम, रूप, जाति, गुण
आदि से युक्त ज्ञान को सविकल्पक कहा गया है।