वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 84, कुल 314 में से
संदर्भ में पढ़ें७० वेदान्तसार
स्थूलमहाभूतों की उत्पत्ति होती है। यहाँ प्रत्येक भूत में अन्य चार भूतों के
मिश्रण को पञ्चीकरण कहा गया है। अर्थात् जो पाँच नहीं है, उन्हें पाँच
बना देने का नाम ही पञ्चीकरण है।
पञ्चीकरण के सिद्धान्त का प्रतिपादन करते हुए आचार्य सदानन्द ने
पञ्चदशी की निम्नकारिका को उद्धृत किया है—
द्विधा विधाय चैकैकं चतुर्धा प्रथमं पुनः।
स्व स्वेतरद्वितीयांशैर्योजनात् पञ्च पञ्च ते॥1/27॥
अर्थात् सबसे पहले आकाश आदि पाँच सूक्ष्मभूतों में प्रत्येक को दो-दो
समान भागों में विभाजित कर लेते हैं। इसप्रकार विभक्त पञ्चतन्मात्राओं के
दस भागों में से पहले पाँच को, छोड़कर दूसरे पाँच भागों को फिर से
बराबर चार-चार भागों में विभाजित करते हैं। तत्पश्चात् उन चार बराबर
भागों में से एक-एक भाग को अपने-अपने दूसरे आधे भाग को छोड़कर
दूसरे चार भूतों के दूसरे अर्धभाग में मिलाने पर एक-एक पञ्चीकृत महाभूत
का निर्माण होता है। वेदान्तदर्शन की भाषा में इसी प्रक्रिया को पञ्चीकरण
की प्रक्रिया कहते हैं। इस सम्पूर्णप्रक्रिया को इसप्रकार भी प्रदर्शित कर
सकते हैं—
चित्र-९
अपञ्चीकृत पञ्चीभूत
[चित्र: पाँच चक्र - आकाश (1/2, 1/8, 1/8, 1/8, 1/8), वायु (1/2, 1/8, 1/8, 1/8, 1/8), अग्नि (1/2, 1/8, 1/8, 1/8, 1/8), जल (1/2, 1/8, 1/8, 1/8, 1/8), पृथिवी (1/2, 1/8, 1/8, 1/8, 1/8)]
| आकाश सूक्ष्मतन्मात्रा | | वायु सूक्ष्मतन्मात्रा | | अग्नि सूक्ष्मतन्मात्रा | | जल सूक्ष्मतन्मात्रा | | पृथिवी सूक्ष्मतन्मात्रा |
चित्र-१०
पञ्चीकृत पञ्चमहाभूत
[चित्र: पाँच चक्र - आ. 1/2 + चार 1/8 भाग, वायु 1/2 + चार 1/8 भाग, अग्नि 1/2 + चार 1/8 भाग, जल 1/2 + चार 1/8 भाग, पृथिवी 1/2 + चार 1/8 भाग]
| आकाश | | वायु | | अग्नि | | जल | | पृथिवी |
(1) स्थूल आकाश= 1/2 आकाश + 1/8 अग्नि + 1/8 वायु+1/8जल+1/8 पृथ्वी
(2) स्थूल वायु= 1/2 वायु + 1/8 आकाश / 1/8 अग्नि+1/8 जल+ 1/8पृथ्वी।
(3) स्थूल अग्नि=1/2 अग्नि+1/8 आकाश+ 1/8 वायु + 1/8 जल + 1/8 पृथ्वी