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सर्वकोश
वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

पृष्ठ 81, कुल 314 में से

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पृष्ठ 81

भूमिका ६७
जैसा कि कथन किया गया कि स्थूलशरीर का निर्माण आकाश आदि
पञ्चीकृत स्थूलभूतों से होता है। यह शरीर ही वस्तुतः जन्म-मरण की
स्थिति को प्राप्त होता है। इसी शरीर द्वारा जीवात्मा कर्म करता है तथा
उससे प्राप्त होने वाले फल को भोगता है। यह स्थूलशरीर माता-पिता द्वारा
खाए हुए तथा जन्म के बाद स्वयं द्वारा खाए अन्न का विकार होने के
कारण अन्नमयकोश कहलाता है तथा जीव की यह जाग्रत अवस्था होती है।
स्थूलशरीर चार प्रकार के होते हैं-(1) जरायुज (2) अण्डज (3)
स्वेदज (4) एवं उद्भिज्ज।
जरायु (उदर में रहने वाली पतली झिल्ली-जेर) से उत्पन्न होने वाले
मनुष्य, पशु आदि जरायुज हैं। अण्डों से उत्पन्न होने वाले पक्षी, सर्प आदि
अण्डज हैं। पसीने से उत्पन्न होने वाले जूँ, मच्छर आदि स्वेदज हैं तथा
भूमि को उद्भेद (फाड़) कर उत्पन्न होने वाले लता, वृक्ष आदि उद्भिज्ज
नामक स्थूलशरीर हैं। स्थूलभोग का आश्रय होने के कारण इन्हें स्थूलशरीर
तथा विषयों का भोग करने के कारण जाग्रत् कहा जाता है। इन चारों
स्थूलशरीरों में मनुष्य की योनि को उत्कृष्ट माना गया है, क्योंकि इसमें उसे
चिन्तन, बोध, संकल्प शक्ति की सामर्थ्य प्राप्त होती है। इस शरीर द्वारा
प्रयत्न करके वह उत्कृष्टस्थिति (देवत्वादि) को भी प्राप्त कर सकता है।
यहाँ तक कि जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त कर सकता है
तथा निकृष्टकर्मों का सम्पादन करके निम्न से निम्न योनियों में भी जा
सकता है। इनमें शेष उद्भिज्जादि दुष्कर्मों के परिणामस्वरूप प्राप्त होने वाली
भोग योनियाँ हैं।
चित्र-७
स्थूल शरीर
जरायुज अण्डज स्वेदज उद्भिज्ज
(मनुष्य, पशु आदि) (पक्षी सर्पादि) (जूँ मच्छरादि) (वृक्ष लतादि)
(११) पञ्चकोष-उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि आत्मा के
आच्छादक तत्त्वों में प्रमुखरूप से अज्ञान की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है,
उसी से ईश्वर, जीव, जगत् आदि की सृष्टि होती है। तीनों प्रकार के शरीरों
के निर्माण एवं विकास में कोशों की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका रहती है। इनकी
संख्या कुल मिलाकर पाँच मानी गई है। (1) आनन्दमयकोष (2)
विज्ञानमयकोष (3) मनोमयकोष (4) प्राणमयकोष तथा (5) अन्नमयकोष।