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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

पृष्ठ 267, कुल 314 में से

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पृष्ठ 267

अनुभववाक्यार्थ-निरूपण २५३
प्रतिबिम्बित होने वाला चैतन्य का आभास तो उस स्थिति में भी विद्यमान
रहेगा ही, तो भला अद्वैत की सिद्धि कैसे हो सकती है?
इसका निवारण करते हुए ग्रन्थकार कहते हैं कि जिसप्रकार दर्पण में
मुख का प्रतिबिम्ब पड़ता है, किन्तु दर्पण के न रहने पर केवल मुखमात्र ही
शेष रहता है, उसका प्रतिबिम्ब अलग से भासित नहीं होता है। ठीक
उसीप्रकार वृत्ति में प्रतिबिम्बित चैतन्य, वृत्ति के नष्ट हो जाने पर अलग से
भासित न होकर बिम्बमात्र अर्थात् चैतन्यमात्र शेष रह जाता है।
जिसप्रकार दीपक का प्रकाश सूर्य को प्रकाशित नहीं कर सकता, उसके
सामने क्षीण हो जाता है। ठीक उसीप्रकार स्वयंप्रकाशस्वरूप, प्रत्यक् अभिन्न
उस परमब्रह्म को वह चैतन्य प्रतिबिम्ब प्रकाशित नहीं कर पाता है, अपितु
जिस अखण्डचित्तवृत्ति के कारण उसकी अलग से प्रतीति हो रही थी, उस
वृत्ति के नष्ट होने पर बिम्बमात्र अर्थात् ब्रह्ममात्र शेष रह जाता है। इसे दर्पण
एवं मुख के उदाहरण द्वारा पहले ही समझाया जा चुका है। अतः संक्षेप में
कहा जा सकता है कि दर्पण के विद्यमान न होने पर प्रतिबिम्ब के अभाव
एवं मुख अर्थात् बिम्बमात्र की उपस्थिति के समान ही वृत्ति के विद्यमान न
रहने पर उस चैतन्य के प्रतिबिम्ब का भी अभाव हो जाता है और वह
बिम्ब अर्थात् प्रत्यग्-अभिन्न परमब्रह्ममात्र ही शेष रहता है, यही 'अहं
ब्रह्मास्मि' महावाक्य का अभिप्राय है।
विशेष-(1) प्रस्तुत गद्यखण्ड के आरम्भ में प्रयुक्त 'अथ' का प्रयोग
अनन्तर अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए हुआ है। यद्यपि 'अथ' पद
अनेकार्थवाची है 'मङ्गलानन्तरारम्भप्रश्नकात्स्न्र्येष्वथो अथ' के अनुसार 'अथ'
पद का प्रयोग मङ्गल, अनन्तर, आरम्भ, प्रश्न एवं कात्स्न्र्य इन पाँच अर्थों
की अभिव्यक्ति के लिए होता है।
(2) प्रस्तुत गद्यखण्ड में परमब्रह्म अर्थात् तुरीय के अनेक विशेषणों का
साभिप्राय प्रयोग किया गया है। जैसे-
(क) शुद्ध-अविद्या आदि दोषों से रहित ब्रह्म।
(ख) बुद्ध-स्वयंप्रकाशभूत अतः जड़ता आदि दोषों से रहित।
(ग) मुक्त-सभीप्रकार की उपाधियों से पूर्णतयारहित।
(घ) सत्यस्वभाव-अनश्वर स्वभावसम्पन्न।
(ङ) अनन्त-देशकाल आदि की दृष्टि से अपरिच्छिन्न।