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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

पृष्ठ 176, कुल 314 में से

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पृष्ठ 176

१६२ वेदान्तसार
तत्पश्चात् अज्ञान की इस व्यष्टि की अन्य विशेषताओं का कथन करते
हुए ग्रन्थकार कहते हैं कि - व्यष्टिरूप अज्ञान में भी यद्यपि सत्त्व, रजस्
और तमोगुण की स्थिति विद्यमान रहती है, किन्तु यहाँ स्थित सत्त्वगुण,
रजोगुण एवं तमोगुण द्वारा पराभूत अथवा अभिभूत होने से मलिन होता है।
इसीलिए इसे जीव की 'निकृष्ट उपाधि' कहा गया है।
उपर्युक्त कथन को हम उदाहरण द्वारा इसप्रकार समझा सकते
हैं-जिसप्रकार धूलि आदि के कण पड़ने से स्वच्छदर्पण की प्रतिबिम्ब को
ग्रहण करने की शक्ति घट जाती है, ठीक उसीप्रकार रजोगुण एवं तमोगुण
से अभिभूत होने के कारण सत्त्वगुण चित्स्वरूप के प्रतिबिम्ब को स्पष्टतया
प्रकाशित करने में समर्थ नहीं होता है और यही जीव के अल्पज्ञत्व का हेतु
भी माना जाता है।
दूसरे शब्दों में व्यष्टिगत अज्ञान में उपाधि की इस निकृष्टता के कारण
ही अज्ञान की उत्कृष्ट उपाधि से युक्त ईश्वर की अपेक्षा जीव अधिक
निकृष्ट होता है। साथ ही वह उत्कृष्ट उपाधियुक्त अज्ञान का स्वामी होने के
कारण सर्वज्ञ, सर्वनियन्ता आदि गुणों से युक्त कहा गया है, जबकि निकृष्ट
उपाधिभूत अज्ञान अथवा माया के अधीन होने के कारण यह जीव अल्पज्ञ
एवं अल्पसामर्थ्य वाला कहा जाता है। इस जीव के ज्ञान पर अज्ञान का
आवरण पड़ा रहने के कारण ही यह निकृष्ट होता है। इसीकारण इसमें
अहङ्कार विद्यमान रहता है तथा आत्मा के अतिरिक्त वस्तुओं का आभास भी
इसी अज्ञानरूप आवरण की निकृष्ट उपाधि के कारण होता है।
पुनः ग्रन्थकार कहते हैं कि इस निकृष्ट उपाधि से आवृत्त चैतन्य को
उसके अल्पज्ञ, अनीश्वरत्व आदि गुणों से युक्त होने से तथा एक ही
व्यष्टिरूप अज्ञान का प्रकाशक होने के कारण विद्वान् आचार्य इसे 'प्राज्ञ'
इस नाम से सम्बोधित करते हैं। इस प्रसङ्ग में यह बात स्मरणीय है
कि-यहाँ प्राज्ञ की प्रकर्षेण जानाति, इति प्रज्ञः, प्रज्ञः एवं प्राज्ञः, प्रकृष्टज्ञान
युक्त इसप्रकार व्युत्पत्ति न करके प्रकर्षेण अज्ञः, इति इसप्रकार व्युत्पत्ति
करके, इसका अत्यधिक अज्ञानी अर्थ करना चाहिए, क्योंकि इसके अल्पज्ञ
आदि विशेषणों के साथ यही व्युत्पत्ति एवं अर्थ संगत प्रतीत होता है।
प्राज्ञ के प्रकृष्ट अज्ञानी होने में ग्रन्थकार दो हेतु प्रस्तुत करते हैं-(1)
अस्पष्ट उपाधि से युक्त होने से तथा (2) एक से अधिक अर्थात् अनेक
का प्रकाशक न होने के कारण, इसे प्राज्ञ कहते हैं। यहाँ रजोगुण एवं