वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 138, कुल 314 में से
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मुख्य अभिप्राय यहाँ बुद्धि की शुद्धि तथा चित्त की एकाग्रता ही माना गया
है।
प्रस्तुत खण्ड के अन्त में ग्रन्थकार अधिकारी के लिए अन्तिम शर्त
‘साधनचतुष्टयसम्पन्न होना' की अनिवार्यता का प्रतिपादन करते हैं। यहाँ
'साधनचतुष्टय' से अभिप्राय (1) नित्य अनित्यवस्तुविवेक (2) ऐहिक एवं
पारलौकिक फलों के प्रति वैराग्यभावना (3) शम, दम, उपरति, तितिक्षा,
समाधान और श्रद्धा आदि छः प्रकार की सम्पत्ति तथा (4) मोक्षप्राप्ति के
लिए प्रबल इच्छा से है। इन चार प्रकार के साधनों से सम्पन्न प्रमाता ही
इस शास्त्र के अध्ययन का अधिकारी हो सकता है, ऐसा आचार्य सदानन्द
प्रतिपादित करते हैं।
इनमें प्रथम, नित्य-अनित्य वस्तुविवेक से अभिप्राय उस निश्चयात्मक
चिन्तन से है, जिसमें प्रमाता एकमात्र परमब्रह्म को नित्य सत्ता वाला तथा
उसके अतिरिक्त समस्त दृश्यमानपदार्थों को अनित्य मानता है। द्वितीय,
विराग-इस संसार में कर्म द्वारा प्राप्त होने वाली भोग-विलास विषयक
सामग्री, जिनमें हम असीम आनन्द का अनुभव करते हैं, कर्मजन्य होने से
अनित्य हैं, क्योंकि जो वस्तु हमें आज दिखायी दे रही है, वही कल नष्ट
हो जाती है। इसीप्रकार यज्ञादिकमों के फलस्वरूप प्राप्त होने वाले स्वर्ग
आदि भी अनित्य ही हैं, क्योंकि पुण्य के विद्यमान रहने तक ही व्यक्ति
स्वर्ग में रह सकता है। उसके बाद उसे पुनः पृथ्वीलोक पर ही जन्म लेना
पड़ता है (क्षीणे पुण्ये निवर्तते मृत्युलोके)। इस दृष्टि से इहलौकिक एवं
पारलौकिकसुखों के प्रति वैराग्य की भावना रखना श्रेयष्कर है।
तृतीय-शमादि षटकसम्पत्ति में शम से अभिप्राय है जिसप्रकार
भूख-प्यास से व्याकुल व्यक्ति का मन बार-बार अन्न एवं जल की ओर
जाता है। ठीक उसीप्रकार श्रवण, मनन इत्यादि को छोड़कर अन्य सांसारिक
विषयों की ओर बार-बार दौड़कर जाते हुए मन को विशेषप्रकार की
अन्तःकरणवृत्ति द्वारा रोका जाना ही 'शम' है। दम- चक्षुश्रोत्रादि बाह्य
इन्द्रियों को ब्रह्मसाक्षात्कार के साधनस्वरूप श्रवण-मनन आदि से व्यतिरिक्त
विषयों में जाने से रोकना ही दम है। दूसरे शब्दों में बाह्य इन्द्रियों को
सांसारिकविषयों की ओर जाने से नियन्त्रित करना ही दम है।
इसीप्रकार शास्त्रों द्वारा बताए गए नित्य, नैमित्तिक कर्मों का शास्त्रोक्त
विधि द्वारा परित्याग करना उपरति है। शरीर का धर्म समझकर सर्दी-गर्मी