वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 110, कुल 314 में से
संदर्भ में पढ़ें९६ वेदान्तसार
भिद्यते हृदयग्रन्थिश्चिद्यन्ते सर्वसंशयाः।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे॥ (2/2/8)
अर्थात् परमब्रह्म के साक्षात्कार के पश्चात् साधक की अज्ञानग्रन्थि विनष्ट
हो जाती है तथा उसके सभीप्रकार के कर्म क्षीण होकर सभी संशय दूर हो
जाते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता में भी अग्नि द्वारा ईंधन को भस्मसात् करने का
उदाहरण देते हुए ज्ञानरूपी अग्नि से सभीप्रकार के कर्मों को जला डालने
की बात कही गयी है-
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात् कुरुतेऽर्जुन।
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुते तथा। (4/37)
फल की दृष्टि से कर्मों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया
है-(1) सञ्चितकर्म, (2) क्रियमाणकर्म, (3) प्रारब्धकर्म। अनादिकाल से
किए गए कर्म जिनका फल अभी प्राप्त नहीं हुआ है, सञ्चितकर्म कहलाते
हैं। मन, वाणी, कर्म द्वारा वर्तमानजन्म में किए जा रहे कर्म क्रियमाणकर्मों
की श्रेणी में आते हैं, क्रियापूर्ण होने पर ये ही सञ्चितकर्मों की कोटि में
आ जाते हैं। चिरकाल के सञ्चितकर्म जब फलोन्मुख होकर शुभाशुभ फल
प्रदान करने में तत्पर हो जाते हैं, उन्हें प्रारब्धकर्म कहा जाता है।
सञ्चित, क्रियमाण तथा प्रारब्धकर्मों का चक्र व्यक्ति के जीवन में
निरन्तर चलता रहता है, किन्तु इस कर्मबन्धन से छुटकारा ज्ञान के उदय या
फल के भोग द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। वेदान्त ज्ञान को मुक्ति का
एकमात्र साधन मानता है। शङ्कराचार्य के अनुसार-'जिसप्रकार आग के बिना
भोजन नहीं पकाया जा सकता है, उसीप्रकार ज्ञान के बिना मोक्षप्राप्ति
असम्भव है।' यहाँ ज्ञान से अभिप्राय ब्रह्मज्ञान से ग्रहण करना चाहिए,
क्योंकि वेदान्त अज्ञान को अनर्थ का मूलकारण स्वीकार करता है। वेदान्त
के अनुसार यह अज्ञान ही जीव में अनेकप्रकार की भ्रान्तियाँ उत्पन्न करता
है, जो उसके बन्धन का कारण बनती हैं।
अज्ञान से उत्पन्न इन सभी भ्रान्तियों का निवारण सद्गुरु के मार्गदर्शन
एवं उपदेश द्वारा प्रदत्त ज्ञान से सम्भव है। अज्ञान. के विनष्ट होने पर जीव
को आत्मबोध ठीक उसीप्रकार हो जाता है, जैसे बादलों के हट जाने पर
सूर्य का प्रकाश हो जाता है, किन्तु ज्ञान का प्रकाश होने पर साधक को
तुरन्त मुक्ति नहीं मिलती, क्योंकि उसे अपने पूर्वजन्मों के सञ्चितकर्मों के
फल को भोगना पड़ता है।