वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
प्रारंभिक पृष्ठ व विषय-सूची
व्याख्याकार
डॉ० श्रीगजानन शास्त्री मुसलगांवकर
वेदान्तपरिभाषा
चौखम्बा विद्याभवन
वाराणसी
॥ श्रीः ॥
विद्याभवन संस्कृत ग्रन्थमाला
१००
श्रीधर्मराजाध्वरीन्द्रविरचिता
वेदान्तपरिभाषा
सविवरण 'प्रकाश' हिन्दीव्याख्योपेता
व्याख्याकार
वेदान्त-मीमांसा-साहित्याचार्य—
डॉ० श्रीगजानन शास्त्री मुसलगांवकर
एम. ए., पी-एच्. डी.
अध्यक्ष—
मीमांसा-धर्मशास्त्रविभाग, प्राच्यविद्या-धर्मविज्ञान-संकाय,
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी
सम्पादक
श्री श्रीरामशास्त्री मुसलगाँवकर
चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी-२२१००१
१९८१
प्रकाशक—
चौखम्बा विद्याभवन
( भारतीय संस्कृति एवं साहित्य के प्रकाशक तथा वितरक )
चौक ( बनारस स्टेट बैंक भवन के पीछे )
पो० बा० नं० १०६९
वाराणसी २२१००१
दूरभाष : ३२०४०४
सर्वाधिकार सुरक्षित
पुनर्मुद्रित संस्करण २०००
मूल्य १२५-००
अन्य प्राप्तिस्थान
चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन
के० ३७/११७, गोपालमन्दिर लेन
पो० बा० नं० ११२९, वाराणसी २२१००१
दूरभाष : ३३३४३१
*
चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान
३८ यू. ए., बंगलो रोड, जवाहरनगर
पो० बा० नं० २११३
दिल्ली ११०००७
दूरभाष : २३६३९१
मुद्रक
फूल प्रिन्टर्स
वाराणसी
THE
VIDYABHAWAN SANSKRIT GRANTHAMALA
100
❦
VEDĀNTAPARIBHĀSA
OF
SRĪ DHARMARĀJĀDHWARINDRA
With
NOTES AND 'PRAKĀŚA' HINDI COMMENTARY
By
Dr. Shri Gajanan Shastri Musalgaonkar
M. A., Ph. D.
Vedanta-Mimansa-Sahityacharya, Sahityaratna,
Head of Department of Mimansa & Dharmashastra
Faculty of Oriental Learning & Theology, B. H. U.
Edited by
Sri Shreeram Shastri Musalgaonkar
CHOWKHAMBA VIDYABHAWAN
VARANASI
© CHOWKHAMBA VIDYABHAWAN
(Oriental Publishers & Distributors)
CHOWK (Behind The Benares State Bank Building)
Post Box No. 1069
VARANASI 221001
Also can be had of
CHAUKHAMBA SURBHARATI PRAKASHAN
K. 37/117, Gopal Mandir Lane
Post Box No. 1129
VARANASI 221001
CHAUKHAMBA SANSKRIT PRATISHTHAN
38 U. A., Jawaharnagar, Bungalow Road
DELHI 110007
Telephone : 236391
श्रीगुरुचरणनामाशीर्वचनम्
आयुष्मता श्रीगजाननशास्त्रिणा निर्मिता वेदान्तपरिभाषाव्याख्या प्रकाशाख्या तत्र तत्र मयाऽवलोकिता । अनेन अद्वैतवेदान्ते प्रविविक्षूणां छात्राणां महानुपकारः सम्भाव्यते । भगवतो विश्वनाथस्य कृपया एतादृशेनास्य कार्येणोत्तरोत्तरमुन्नतिर्भवत्वित्याशिषा संवर्धयामि ।
श्रीराजेश्वरशास्त्री द्राविडः
श्रीहरिरामशुक्लः
ब्रह्मभावमवाप्ताः पूजनीयाः श्रीगुरुचरणाः
पद्मभूषण-पण्डितराज-राजेश्वरशास्त्रिचरणाः
श्रद्धाञ्जलिः
याते दिवं गुरुवरे द्रविडावतंसे
राजेश्वरे जगति पण्डितराजनाम्नि ।
वात्सल्यमात्मनि दधन्मधुरं तदीयं
श्रद्धाञ्जलिं चरणयो भृंशमर्पयामि ॥
गुरुचरण-वियोग-जनित शोक-सन्तप्तमना
मुसलगाँवकरोपनामा गजाननः
पूजनीयाः श्रीपितृचरणाः
महामहोपाध्याय-श्रीसदाशिवशास्त्रिचरणाः
समर्पणम्
विद्याव्रतं तपसि संस्थितमाशुतोषं
जोषं प्रबोधगिरिमूर्ध्नि विराजमानम् ।
कण्ठे नियम्य गरल ददतं सुधां न-
स्तातं सदाशिवम हं शिवमानतोऽस्मि ॥
संस्कृत्य मे मतिभुवं भवतैव शास्त्र-
बीजं यदुत्तममचात्मरसेन सिक्तम् ।
तस्यैव बोधसुतरोः फलमेतदद्य
नैवेद्यमर्पयति तात ! गजाननोऽयम् ॥
वेदान्तपरिभाषाया व्याख्यां विख्यातकीर्तये ।
अर्पयँस्तातपादाय प्रीतिं विन्दामि चेतसि ॥
विनयावनतो
गजाननः
॥ श्रीः ॥
शास्त्र-मर्मज्ञ विद्वानों के आशीर्वाद
श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्यवर्य श्रीमच्छंकर भगवत्पाद-प्रतिष्ठित श्रीकाञ्ची कामकोटि पीठाधिप जगद्गुरु श्रीमच्चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती श्रीपादादेशानुसारेण श्रीमज्जयन्द्रसरस्वतीश्रीपादैः क्रियते नारायणस्मृतिः ।
अद्वैतवेदान्तशास्त्रप्रमेयजिज्ञासूनामुपकाराय महाविदुषा श्रीधर्मराजाध्वरीन्द्रेण रचितायाः वेदान्तपरिभाषायाः वाराणसीक्षेत्रवास्तव्येन मीमांसाचार्येण श्रीगजानन-शास्त्रिमुसलगांवकरमहोदयेन कृता प्रकाशाख्य-हिन्दीव्याख्या उचितविवरण-शङ्का-समाधानसहिता अत्र उपहृता ।
हिन्दीज्ञाः साधारणजनाः छात्राश्च एतद्ग्रन्थसाहाय्येन अद्वैतवेदान्त-प्रमेयाणि जानन्तः, यथार्हं भाष्यादिग्रन्थ-पठनेन आत्मज्ञानप्राप्तियोग्यतां संपादयेयुरिति, श्रीमुसलगांवकरमहोदयाश्च एवंविधसद्ग्रन्थान् रचयन्तो भगवत्प्रसादात् प्रेयः श्रेयःपरम्पराः अवाप्नुयुरितिचाऽऽशास्महे ।
—नारायणस्मृतिः
परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रीशंकरावतार अनन्त-श्रीविभूषित स्वामी करपात्रीजीमहाराज
पण्डित मुसलगांवर्कर, श्री गजानन शास्त्री न्याय, वेदान्त, मीमांसा, सांख्य-योगादि शास्त्रों के प्रकाण्ड पण्डित हैं । विशेषतः उनकी लेखन शैली बहुत ही अच्छी है, विविध युक्तियों के द्वारा कठिन से कठिन ग्रन्थों के विषयों को सरल एवं सुबोध बना देने की कला उनमें ईश्वर की देन है । उनके अनेक ग्रन्थों में यह वेदान्त परिभाषा की हिन्दी प्रकाशाव्याख्या अन्यतम ग्रन्थ है । इसमें विषय का स्पष्टीकरण बहुत सुन्दर ढङ्ग से किया गया है तथा विषमस्थलों की टिप्पणियाँ भी महत्त्वपूर्ण हैं । आशा है जिज्ञासु सज्जन इससे पर्याप्त लाभ उठायेंगे ।
—करपात्र स्वामी
( २ )
परमहंस-परिव्राजकाचार्य
श्री १००८ स्वामी श्री महेशनन्दगिरिजी महाराज
महामण्डलेश्वर
( श्री दक्षिणामूर्ति संस्कृत महाविद्यालय, वाराणसी )
वेदान्त परिभाषा वेदान्त का उत्कृष्ट प्रकरण ग्रंथ है । इसकी हिन्दी विवरण सहित 'प्रकाश' व्याख्या का पूर्ण प्रामाणिक संस्करण उपलब्ध कराकर पण्डित श्रीगजाननशास्त्री मुसलगांवकर जी ने अद्वैतजगत् का अद्भुत उपकार किया है । स्थान-स्थान पर दुरूह स्थलों पर अनेक दार्शनिक पक्षों को समझाने का भी स्तुत्य प्रयास किया है । अन्य दर्शनों को जिसने नहीं भी पढ़ा है इससे अवश्य लाभ उठा सकेंगे । भगवान् शंकर से प्रार्थना है कि वे पण्डितजी को दीर्घायु प्रदान करें, जिससे प्रस्थानत्रयी भाष्यों का भी ऐसा ही उत्कृष्ट अनुवाद उपस्थित कर सकें ।
—महेशानन्दगिरि
विद्वन्मूर्धन्य स्वामी योगीन्द्रानन्द जी महाराज
( अध्यक्ष : उदासीन संस्कृत महाविद्यालय, वाराणसी )
प्रायः सभी दर्शनों की परिभाषाओं को सुस्पष्ट करने के लिए परिभाषा ग्रंथों की रचना की गई है । ऐसे ग्रन्थों में "वेदान्त-परिभाषा" का प्रमुख स्थान है । यह अपने कार्य में सर्वाधिक सफल माना जाता है । ग्रन्थ की सफलता ग्रन्थकार की योग्यता पर निर्भर होती है । इस महान् ग्रन्थ के रचयिता श्री धर्मराजाध्वरीन्द्र न्याय, मीमांसा, वेदान्त आदि के प्रकाण्ड विद्वान् थे । श्रीगंगेशोपाध्याय के "चिन्तामणि" ग्रन्थ पर इन्होंने एक ऐसी विशिष्ट व्याख्या लिखी थी, जिसमें पूर्ववर्ती दश टीकाओं का मानमर्दन किया गया था । इसका कुछ अंश गायकवाड़ पुस्तकालय में सुरक्षित पाया गया है ।
ग्रन्थकार के समकक्ष विद्वान् की व्याख्या में ही ग्रन्थ का हृदय खुला करता है । प्रकृत 'प्रकाश' नामक हिन्दी व्याख्या के लिए गर्व एवं उदात्तस्वर से कहा जा सकता है कि यह वेदान्त-परम्परा की एक ठोस कृति है । समग्र व्याख्या मैंने देखी है । कई स्थलों पर सचमुच मूल से भी अधिक विषय का प्रतिपादन किया गया है । हिन्दी जगत् में ऐसी अनुपम और अमूल्य रचना प्रस्तुत करने के लिए मैं न्याय, मीमांसा, वेदान्त आदि के प्रख्यात मर्मज्ञ पण्डित प्रवर श्री गजाननशास्त्री मुसलगांवकर को अनन्त धन्यवाद देता हूँ ।
—योगीन्द्रानन्द