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वेद स्वरूप विमर्श (स्वामी करपात्री जी महाराज - अपौरुषेय वेद-प्रामाण्य एवं वैदिक समन्वय)

वेद स्वरूप विमर्श (स्वामी करपात्री जी महाराज - अपौरुषेय वेद-प्रामाण्य एवं वैदिक समन्वय)

Veda Swaroop Vimarsha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished237 पृष्ठ

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पृष्ठ 147

? Wait, look at the letters: पृ थि व्या श्चे न्द्रे? No, श्चे न्द् र स्य! Yes, श्चे+न्द्र+स्य=श्चेन्द्रस्य! So it is literally printed: पृथिव्याश्चेन्द्रस्य! (पृथिव्याः च इन्द्रस्य च आकर्षणात् = पृथिव्याश्चेन्द्रस्य चाकर्षणात्). That explains both the श्चेandचाकर्षणात्`!

  • L14: तत्रान्त्याधानेन पूर्वं शरीराग्निरूप आत्मा संस्क्रियते ।
  • L15: प्राकृत्सीमकपदवाच्यै- -> look at L15: प्राकृत्सीमकपदवाच्यै- - wait, प्राकृत्सीमक or प्राकृतसीमक?
    Look at कृत्: कृ with a त् half-t?
    Wait, look closely: प्रा कृ त् सी म क? Or प्राकृतसीमक?
    Wait, is that a त् or a broken letter? प्राकृत्सीमकपदवाच्यै- -> wait, what does प्राकृत्सीमक mean?
    Wait, could it be प्राकृतसीमक? No,