वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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द्वितीयोंऽशः २८३
- सरोजिनी *
'परमशिवे'— परमशिव में 'परमशिव' कौन है? काश्मीर शैव दर्शन के
अनुसार 'परमशिव' शिव की विश्वोत्तीर्ण अवस्था है तथापि वह विश्वमय एवं
विश्वोत्तीर्ण दोनों एक साथ है । वह विश्वमय होकर अपने विश्वोत्तीर्ण स्वरूप से
किंचिन्मात्र भी च्युत नहीं होता । 'विश्वमयत्वेप्यस्य स्वस्वरूपात्र प्रच्यवः ॥'' इसलिए
'अतएवं अयं विश्वमयत्वेडिप विश्वोत्तीर्णस्तुत्तीर्णत्वेडिप तन्मयः ॥'¹ इस प्रकार एक
मात्र 'परमशिव' की नानात्मक विचित्रताओं के साथ विश्व भाव से स्फुरित हो रहा
है । वह स्वकारस्वरूप है और उससे भिन्न किसी भी पदार्थ की सत्ता नहीं है । वह
विश्वात्मक होते हुए ही विश्वोत्तीर्ण एवं विश्वोत्तीर्ण होते हुए भी विश्वमय है ।²
अथ परदेवताया विद्यायाश्चक्रराजस्य श्रीगुरोरात्मनश्चैक्यं कौलिकार्थ इत्युच्यते,
सर्वेषां ब्रह्माभेदेन सजातीयत्वात्, सजातीययूथस्य कुलपदवाच्यत्वात्, 'सजातीयैः कुलं
यूथम्' इत्यमरोक्तेः । अयं च पञ्चानामभेदः समानधर्मवत्वेन सिषाधयिषितः । स च
समानो धर्मः ।
'गणेशग्रहनक्षत्रयोगिनीराशिरूपिणीम् ।
देवीं मन्त्रमयीं नौमि मातृकापीठरूपिणीम् ॥'
इति तन्त्रराजोक्तगणेशादिषट्कात्मकत्वाख्यः । तत्र परदेवतायां प्रथमं गणेशत्व-
मुपपादयति—
माता निरुपमतेजोमय्याः स्वस्या मरीचिरूपाणाम् ।
आवरणदेवतानामीशत्वादुच्यते गणेशीति ॥ ८३ ॥
(देवी की गणेशरूपता)
जगज्जनती (माता त्रिपुरसुन्दरी) अनुपमेय तेज संवलित अपनी प्रकाश-
रश्मियों के स्वरूपवाली आवरण देवताओं की स्वामिनी होने के कारण गणेशी कही
जाती हैं ॥ ८३ ॥ - प्रकाश *
'न तत्र सूर्यो भाति' इत्यादिश्रुत्या प्रतिपादितानवधिकतेजोरूपब्रह्मणो मरीचय
एवावरणदेवताः । ताश्चैकादशोत्तरशतसंख्याकाः । तन्त्रभेदेनान्या अपि प्रतिपादिताः ।
तादृशदेवतागणस्येशत्वाद् गणेशीत्युच्यते माता ॥ ८३ ॥ - सरोजिनी *
'न तत्र सूर्यो भाति' कहकर वेदों में जिस परमतेजोमय, अनधिगम्य, अज्ञेय
परात्पर तत्त्व के स्वरूप का वर्णन किया गया है उस अनवधिक तेजोमय ब्रह्म की
किरणें ही आवरण देवता हैं । ये सभी एकादशोत्तरशत संख्याक् हैं । इन आवरण
१-२. अभिनवगुप्त—'तन्त्रालोक' की टीका (पृ० १०५)