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वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

प्रारंभिक पृष्ठ (भूमिका एवं विषय-सूची)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
1361

संक्षिप्त

श्रीवराहपुराण

केवल हिन्दी, सचित्र, मोटा टाइप


(चित्र: भगवान् श्रीवराह — चित्रकार: जे. एन. प्रसाद)


गीताप्रेस, गोरखपुर
GITA PRESS, GORAKHPUR

॥ श्रीहरिः ॥
1361

संक्षिप्त

श्रीवराहपुराण

(सचित्र, मोटा टाइप, केवल हिन्दी)

गीताप्रेस, गोरखपुर

In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

1361

॥ ॐ ॥

संक्षिप्त

श्रीवराहपुराण

( सचित्र, मोटा टाइप, केवल हिन्दी )


त्वमेव माता च पिता त्वमेव
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव
त्वमेव सर्वं मम देवदेव॥


गीताप्रेस, गोरखपुर

सं० २०७४ तेरहवाँ पुनर्मुद्रण ३,०००
कुल मुद्रण ३८,०००

❖ मूल्य—₹ १२०
( एक सौ बीस रुपये )

प्रकाशक एवं मुद्रक—
गीताप्रेस, गोरखपुर—२७३००५
( गोबिन्दभवन-कार्यालय, कोलकाता का संस्थान )
फोन : ( ०५५१ ) २३३४७२१, २३३१२५०; फैक्स : ( ०५५१ ) २३३६९९७
web : gitapress.org e-mail : [email protected]
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॥ श्रीहरिः ॥

निवेदन

पुराण भारतकी सर्वोत्कृष्ट निधि हैं। प्राचीनकालसे ही भारतवर्षमें पुराणोंका बड़े आदरके साथ पठन-पाठन, श्रवण-मनन और अनुशीलन होता आया है। भारतीय मानसमें भगवद्भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, सदाचार तथा धर्मपरायणताको दृढ़तापूर्वक प्रतिष्ठित करने एवं मानव-जीवनके अन्तिम लक्ष्य—'भगवत्प्राप्ति' अथवा 'मोक्ष्य-साधन'की ओर प्रेरित करनेका श्रेय वस्तुतः पुराणोंको ही है। वेदादि शास्त्रोंके गूढ़तम ज्ञान-तत्त्वों एवं रहस्योंको सरल, रोचक एवं सुमधुर आख्यान-शैलीमें सर्वसाधारणके लिये सुलभ (उपलब्ध) करा देना ही पुराणोंकी अपूर्व विशेषता है। इसीलिये पुराणोंको भारतीय वाङ्‌मयमें विशिष्ट सम्मान और लोकप्रियता प्राप्त है।

पुराणोंकी ऐसी विलक्षण महिमा और महत्त्वको सादर स्वीकार करते हुए गीताप्रेसने 'कल्याण'के विशेषाङ्कोंके माध्यमसे समय-समयपर अनेक पुराणोंका सरल हिन्दी-अनुवाद जनहितमें प्रकाशित किया है। 'संक्षिप्त वराहपुराणाङ्क' भी उनमेंसे एक है। यह 'कल्याण' के ५१वें वर्षके विशेषाङ्कके रूपमें जनवरी १९७७ ई०में प्रकाशित किया गया था। 'वराहपुराण'की गणना परम सात्त्विक पुराणोंमें की जाती है। इसकी कथाएँ बड़ी ज्ञानप्रद, रोचक और कल्याणकारी हैं। भगवत्परायणता, ज्ञान, वैराग्य, साधना एवं अध्यात्मके विकासके लिये इसका अनुशीलन बड़ा ही महत्त्वपूर्ण और उपयोगी है। इसमें भगवान् श्रीहरिके वराह-अवतारकी मुख्य कथाके साथ अनेक तीर्थ, व्रत, यज्ञ-यजन श्राद्ध, तर्पण, दान और अनुष्ठान आदिका शिक्षाप्रद और आत्मकल्याणकारी वर्णन है। भगवान् श्रीहरि (श्रीमन्नारायण)-की महिमा, पूजन-विधान, हिमालयकी पुत्रीके रूपमें गौरीकी उत्पत्तिका वर्णन और भगवान् शङ्करके साथ उनके विवाहकी रोचक कथा इसमें विस्तारसे वर्णित है। इसके अतिरिक्त इसमें वराह-क्षेत्रवर्ती आदित्य-तीर्थोंका वर्णन, भगवान् श्रीकृष्ण और उनकी लीलाओंके प्रभावसे मथुरामण्डल और व्रजके समस्त तीर्थोंकी महिमा और उनके प्रभावका भी विशद तथा रोचक वर्णन है।

अमावस्या-तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें पितरोंकी उत्पत्तिका कथन एवं पूर्णिमा-तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें चन्द्रमाकी उत्पत्तिका वर्णन, मोक्षदायिनी पवित्र नदियोंकी उत्पत्ति, प्रभाव तथा माहात्म्यादि भी इसमें वर्णित हैं। इसके अतिरिक्त इसमें स्नान, दान, तर्पण आदिकी महिमाके साथ पुण्यकर्मों तथा पापकर्मोंके फलोंका विस्तृत वर्णन है। ब्रह्मा, विष्णु, शिवादि त्रिदेवोंकी महिमासहित उनके दिव्य लोकों—ब्रह्मलोक, शिवलोक और वैकुण्ठ आदिका भी इसमें बड़ा ही सुन्दर वर्णन है। साथ ही पुण्यकर्मोंके फलस्वरूप स्वर्गादि दिव्य लोकोंकी प्राप्ति और पापकर्मोंके परिणाम-स्वरूप भयावह नरकोंकी यातनाका भी वर्णन है। जो मनुष्यको अच्छे और बुरे कर्मोंके करने या उनसे बचनेकी प्रेरणा देता है। संक्षेपमें इसकी सभी कथाएँ अत्यन्त ज्ञानप्रद, रोचक और पुण्यप्रद कर्मोंकी ओर प्रेरित करनेवाली एवं पापकर्मोंसे विरत करनेवाली हैं। वराहपुराणकी फलश्रुति भी इसमें महत्त्वपूर्ण है।

हमारा विशेष प्रेमानुरोध है कि कल्याणकामी सभी महानुभावों, अध्यात्मचेता साधकों और समस्त श्रद्धालुजनोंको इसके अधिकाधिक अध्ययन-अनुशीलनद्वारा विशिष्ट पारमार्थिक लाभ उठाना चाहिये।

—प्रकाशक

विषय-सूची

क्रमपृष्ठ-संख्याक्रमपृष्ठ-संख्या
१-भगवान् वराहके प्रति पृथ्वीका प्रश्न और भगवान्‌के उदरमें विश्वब्रह्माण्डका दर्शनकर भयभीत हुई पृथ्वीद्वारा उनकी स्तुति................९उनका ब्रह्ममें लीन होना ..............................४८
२-विभिन्न सर्गोंका वर्णन तथा देवर्षि नारदको वेदमाता सावित्रीका अद्भुत कन्याके रूपमें दर्शन होनेसे आश्चर्यकी प्राप्ति ........................१११५-महातपाका उपाख्यान ................................५०
३-देवर्षि नारदद्वारा अपने पूर्वजन्मवर्णनके प्रसङ्गमें 'ब्रह्मपारस्तोत्र' का कथन............................१५१६-प्रतिपदा तिथि एवं अग्निकी महिमाका वर्णन .......५१
४-महामुनि कपिल और जैगीषव्यद्वारा राजा अश्वशिराको भगवान् नारायणकी सर्वव्यापकताका प्रत्यक्ष दर्शन कराना .................................१७१७-अश्विनीकुमारोंकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग और उनके द्वारा भगवत्स्तुति ......................................५२
५-रैभ्य मुनि और राजा वसुका देवगुरु बृहस्पतिसे संवाद तथा राजा अश्वशिराद्वारा यज्ञमूर्ति भगवान् नारायणका स्तवन एवं उनके श्रीविग्रहमें लीन होना......................................................२०१८-गौरीकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग, द्वितीया तिथि एवं रुद्रद्वारा जलमें तपस्या, दक्षके यज्ञमें रुद्र और विष्णुका संघर्ष ...........................................५४
६-पुण्डरीकाक्षपार-स्तोत्र, राजा वसुके जन्मान्तरका प्रसङ्ग तथा उनका भगवान् श्रीहरिमें लय होना ...२३१९-तृतीया तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें हिमालयकी पुत्रीरूपमें गौरीकी उत्पत्तिका वर्णन और भगवान् शंकरके साथ उनके विवाहकी कथा .....५८
७-रैभ्य-सनत्कुमार-संवाद, गयामें पिण्डदानकी महिमा एवं रैभ्य मुनिका ऊर्ध्वलोकमें गमन .......२६२०-गणेशजीकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग और चतुर्थी तिथिका माहात्म्य ......................................६१
८-भगवान्‌का मत्स्यावतार तथा उनकी देवताओंद्वारा स्तुति ....................................३०२१-सर्पोंकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग और पञ्चमी तिथिकी महिमा ..........................................६३
९-राजा दुर्जयके चरित्र-वर्णनके प्रसङ्गमें मुनिवर गौरमुखके आश्रमकी शोभाका वर्णन ................३२२२-षष्ठी तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें स्वामी कार्तिकेयके जन्मकी कथा ............................६५
१०-राजा दुर्जयका चरित्र तथा नैमिषारण्यकी प्रसिद्धिका प्रसङ्ग ....................................३५२३-सप्तमी तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें आदित्योंकी उत्पत्तिकी कथा ..........................................६८
११-राजा सुप्रतीककृत भगवान्‌की स्तुति तथा श्रीविग्रहमें लीन होना ..............................४०२४-अष्टमी तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें मातृकाओंकी उत्पत्तिकी कथा ..........................................६९
१२-पितरोंका परिचय, श्राद्धके समयका निरूपण तथा पितृगीत..........................................४२२५-नवमी तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें दुर्गादेवीकी उत्पत्ति-कथा ...........................................७१
१३-श्राद्ध-कल्प..........................................४५२६-दशमी तिथिके माहात्म्यके प्रसङ्गमें दिशाओंकी उत्पत्तिकी कथा ..........................................७४
१४-गौरमुखके द्वारा दस अवतारोंका स्तवन तथा२७-एकादशी तिथिके माहात्म्यके प्रसङ्गमें कुबेरकी उत्पत्ति-कथा ...........................................७४
२८-द्वादशी तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें उसके अधिष्ठाता श्रीभगवान् विष्णुकी उत्पत्ति-कथा .....७५
२९-त्रयोदशी तिथि एवं धर्मकी उत्पत्तिका वर्णन ........७६
३०-चतुर्दशी तिथिके माहात्म्यके प्रसङ्गमें रुद्रकी

(५)

क्रमपृष्ठ-संख्याक्रमपृष्ठ-संख्या
उत्पत्तिका वर्णन .................७८६३-कलियुगका वर्णन .................१२५
३१-अमावास्या तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें पितरोंकी<br>उत्पत्तिका कथन .................८१६४-प्रकृति और पुरुषका निर्णय .................१२८
३२-पूर्णिमा तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें उसके स्वामी<br>चन्द्रमाकी उत्पत्तिका वर्णन .................८१६५-वैराज-वृत्तान्त .................१२९
३३-प्राचीन इतिहासका वर्णन .................८३६६-भुवन-कोशका वर्णन .................१३२
३४-आरुणि और व्याधका प्रसङ्ग, नारायण-मन्त्रश्रवणसे<br>बाघका शापसे उद्धार .................८४६७-जम्बूद्वीपसे सम्बन्धित सुमेरुपर्वतका वर्णन ...........१३४
३५-सत्यतपाका प्राचीन प्रसङ्ग .................८७६८-आठ दिक्पालोंकी पुरियोंका वर्णन .................१३७
३६-मत्स्य-द्वादशीव्रतका विधान तथा फल-कथन ......८८६९-मेरुपर्वतका वर्णन .................१३७
३७-कूर्म-द्वादशीव्रत .................९३७०-मन्दर आदि पर्वतोंका वर्णन .................१३९
३८-वराह-द्वादशीव्रत .................९४७१-मेरुपर्वतके जलाशय .................१३९
३९-नृसिंह-द्वादशीव्रत .................९६७२-मेरुपर्वतकी नदियाँ .................१४१
४०-वामन-द्वादशीव्रत .................९७७३-देवपर्वतोंपरके देव-स्थानोंका परिचय..................१४२
४१-जामदग्न्य-द्वादशीव्रत .................९८७४-नदियोंका अवतरण .................१४३
४२-श्रीराम एवं श्रीकृष्ण-द्वादशीव्रत .................९९७५-नैषध एवं रम्यकवर्षोंके कुलपर्वत, जनपद<br>और नदियाँ .................१४४
४३-बुद्ध-द्वादशीव्रत .................१००७६-भारतवर्षके नौ खण्डोंका वर्णन .................१४६
४४-कल्कि-द्वादशीव्रत .................१०२७७-शाक एवं कुशद्वीपोंका वर्णन .................१४७
४५-पद्मनाभ-द्वादशीव्रत .................१०३७८-क्रौञ्च और शाल्मलिद्वीपका वर्णन .................१४८
४६-धरणीव्रत .................१०५७९-त्रिशक्ति-माहात्म्य और सृष्टिदेवीका आख्यान .......१४९
४७-अगस्त्य-गीता .................१०७८०-त्रिशक्ति-माहात्म्यमें 'सृष्टि', 'सरस्वती' तथा 'वैष्णवी'<br>देवियोंका वर्णन .................१५१
४८-अगस्त्य-गीतामें पशुपालकका चरित्र .................१०८८१-महिषासुरकी मन्त्रणा और देवासुर-संग्राम ...........१५३
४९-उत्तम पति प्राप्त करनेका साधनस्वरूप व्रत ..........१०९८२-महिषासुरका वध .................१५५
५०-शुभ-व्रत .................११०८३-'त्रिशक्तिमाहात्म्य'में रौद्रीव्रत .................१५८
५१-धन्य-व्रत .................११२८४-रुद्रके माहात्म्यका वर्णन .................१६१
५२-कान्ति-व्रत .................११३८५-सत्यतपाका शेष वृत्तान्त .................१६२
५३-सौभाग्य-व्रत .................११४८६-तिलधेनुका माहात्म्य .................१६४
५४-अविघ्नव्रत .................११५८७-जलधेनु एवं रसधेनु-दानकी विधि .................१६८
५५-शान्ति-व्रत .................११६८८-गुड़धेनु-दानकी विधि .................१६९
५६-काम-व्रत .................११६८९-शर्करा तथा मधुधेनुके दानकी विधि .................१७०
५७-आरोग्य-व्रत .................११७९०-'क्षीरधेनु' तथा 'दधिधेनु'-दानकी विधि ...........१७२
५८-पुत्रप्राप्ति-व्रत .................११९९१-'नवनीतधेनु' तथा 'लवणधेनु' की दानविधि .......१७३
५९-शौर्य एवं सार्वभौम-व्रत .................११९९२-'कार्पास' एवं 'धान्य-धेनु' की दानविधि ..........१७५
६०-राजा भद्राश्वका प्रश्न और नारदजीके द्वारा<br>विष्णुके आश्चर्यमय स्वरूपका वर्णन...............१२०९३-कपिलादानकी विधि एवं माहात्म्य .................१७६
६१-भगवान् नारायण-सम्बन्धी आश्चर्यका वर्णन ........१२२९४-कपिला-माहात्म्य, 'उभयतोमुखी' गोदान,<br>हेम-कुम्भदान और पुराणकी प्रशंसा............१७७
६२-सत्ययुग, त्रेता और द्वापर आदिके गुणधर्म..........१२३९५-पृथ्वीद्वारा भगवान्‌की विभूतियोंका वर्णन ...........१८१
९६-श्रीवराहावतारका वर्णन .................१८२

( ६ )

क्रमपृष्ठ-संख्याक्रमपृष्ठ-संख्या
९७- विविध धर्मोंकी उत्पत्ति१८४१२३- शालग्रामक्षेत्रका माहात्म्य२७०
९८- सुख और दुःखका निरूपण१८६१२४- रुरुक्षेत्र एवं हृषीकेशके माहात्म्यका वर्णन२७३
९९- भगवान्‌की सेवामें परिहार्य बत्तीस अपराध१८८१२५- 'गोनिष्क्रमण'-तीर्थ और उसका माहात्म्य२७५
१००- पूजाके उपचार१९०१२६- स्तुतस्वामीका माहात्म्य२७७
१०१- श्रीहरिके भोज्य पदार्थ एवं भजन-ध्यानके नियम१९४१२७- द्वारका-माहात्म्य२७८
१०२- मुक्तिके साधन१९५१२८- सानन्दूर-माहात्म्य२८०
१०३- कोकामुखतीर्थ (वराहक्षेत्र) का माहात्म्य१९७१२९- लोहार्गल-क्षेत्रका माहात्म्य२८१
१०४- पुष्पादिका माहात्म्य२०११३०- मथुरातीर्थकी प्रशंसा२८३
१०५- वसन्त आदि ऋतुओंमें भगवान्‌की पूजा करनेकी विधि और माहात्म्य२०३१३१- मथुरा, यमुना और अक्रूरतीर्थोंके माहात्म्य२८५
१०६- माया-चक्रका वर्णन तथा मायापुरी (हरिद्वार) का माहात्म्य२०५१३२- मथुरा-मण्डलके 'वृन्दावन' आदि तीर्थ और उनमें स्नान-दानादिका महत्त्व२८९
१०७- कुब्जाम्रकतीर्थ (हृषीकेश) का माहात्म्य, रैभ्यमुनिपर भगवत्कृपा२१३१३३- मथुरा-तीर्थका प्रादुर्भाव, इसकी प्रदक्षिणाकी विधि एवं माहात्म्य२९१
१०८- दीक्षासूत्रका वर्णन२२११३४- देववन और 'चक्रतीर्थ' का प्रभाव२९५
१०९- क्षत्रियादि-दीक्षा एवं गणान्तिकादीक्षाकी विधि तथा दीक्षित पुरुषके कर्तव्य२२३१३५- 'कपिल-वराह' का माहात्म्य२९७
११०- पूजाविधि और ताम्रधातुकी महिमा२२६१३६- अन्नकूट (गोवर्धन) पर्वतकी परिक्रमाका प्रभाव३००
१११- राजाके अन्न-भक्षणका प्रायश्चित्त२२९१३७- असिकुण्ड-तीर्थ तथा विश्रान्तिका माहात्म्य३०३
११२- दातुन न करने तथा मृतक एवं रजस्वलाके स्पर्शका प्रायश्चित्त२२९१३८- मथुरा तथा उसके अवान्तरके तीर्थोंका माहात्म्य३०५
११३- भगवान्‌की पूजा करते समय होनेवाले अपराधोंके प्रायश्चित्त२३०१३९- गोकर्णतीर्थ और सरस्वतीकी महिमा३०७
११४- सेवापराध और प्रायश्चित्त-कर्मसूत्र२३३१४०- सुगेका मथुरा जाना और वसुकर्णसे वार्तालाप३०९
११५- वराहक्षेत्रकी महिमाके प्रसङ्गमें गीध और शृंगालका वृत्तान्त तथा आदित्यको वरदान२३८१४१- गोकर्णका दिव्य देवियोंसे वार्तालाप तथा मथुरामें जाना३११
११६- वराहक्षेत्रान्तर्वर्ती 'आदित्यतीर्थ' का प्रभाव (खञ्जरीटकी कथा)२४७१४२- ब्राह्मण-प्रेत-संवाद, सङ्गम-महिमा तथा वामन-पूजाकी विधि३१३
११७- भगवान्‌के मन्दिरमें लेपन एवं संकीर्तनका माहात्म्य२५११४३- ब्राह्मण-कुमारीकी मुक्ति३१६
११८- कोकामुख-बदरी-क्षेत्रका माहात्म्य२५६१४४- साम्बको शाप लगना और उनका सूर्याराधन व्रत३१९
११९- 'बदरिकाश्रम' का माहात्म्य२५९१४५- शत्रुघ्नका चरित्र, सेवापराध एवं मथुरा माहात्म्य३२१
१२०- उपासनाकर्म एवं नारीधर्मका वर्णन२६११४६- श्राद्धसे अगस्तिका उद्धार, श्राद्ध-विधि तथा 'ध्रुवतीर्थ' की महिमा३२३
१२१- मन्दारकी महिमाका निरूपण२६२१४७- काष्ठ-पाषाण प्रतिमाके निर्माण, प्रतिष्ठा एवं पूजाकी विधि३२७
१२२- सोमेश्वरलिङ्ग, मुक्तिक्षेत्र (मुक्तिनाथ) और त्रिवेणी आदिका माहात्म्य२६४१४८- मृन्मयी एवं ताम्र-प्रतिमाओंकी प्रतिष्ठा-विधि३३०
१४९- कांस्य-प्रतिमा-स्थापनकी विधि३३३
१५०- रजत-स्वर्णप्रतिमाके स्थापन तथा शालग्राम

( ७ )

क्रमपृष्ठ-संख्याक्रमपृष्ठ-संख्या
और शिवलिङ्गकी पूजाका विधान३३४१६०- कर्मविपाक-निरूपण३६९
१५१- सृष्टि और श्राद्धकी उत्पत्ति-कथा एवं पितृयज्ञका वर्णन३३५१६१- दानधर्मका महत्त्व३७१
१५२- अशौच, पिण्डकल्प और श्राद्धकी उत्पत्तिका प्रकरण३४०१६२- पतिव्रतोपाख्यान३७४
१५३- श्राद्धके दोष और उसकी रक्षाकी विधि३४५१६३- पतिव्रताके माहात्म्यका वर्णन३७७
१५४- श्राद्ध और पितृयज्ञकी विधि तथा दानका प्रकरण३४८१६४- कर्मविपाक एवं पापमुक्तिके उपाय३७८
१५५- 'मधुपर्क' की विधि और शान्तिपाठकी महिमा३५३१६५- पाप-नाशके उपायका वर्णन३८१
१५६- नचिकेताद्वारा यमपुरीकी यात्रा३५६१६६- गोकर्णेश्वरका माहात्म्य३८४
१५७- यमपुरीका वर्णन३५८१६७- गोकर्णमाहात्म्य और नन्दिकेश्वरको वर-प्रदान३८७
१५८- यम-यातनाका स्वरूप३६११६८- गोकर्णेश्वर तथा जलेश्वरके माहात्म्यका वर्णन३९२
१५९- राक्षस-यमदूत-संघर्ष तथा नरकके क्लेश३६७१६९- 'गोकर्णेश्वर' और 'शृङ्गेश्वर' आदिका माहात्म्य३९८
१७०- वराहपुराणकी फल-श्रुति३९९

चित्र-सूची

सादे

नरकोंके दृश्य और उनके नाम—

नरकका नामपृष्ठ-संख्यानरकका नामपृष्ठ-संख्या
१- संदंश३६३६- महारौरव३६३
२- संतप्त३६३७- प्राणरोध३६४
३- असिपत्रवन३६३८- अवीचिमान३६४
४- कुम्भीपाक३६३९- अयःपान३६४
५- रौरव३६३१०- सूकरमुख३६४
११- शूलग्रह३६४
१२- सूर्मि३६४

(चित्र: भगवान् वराह अवतार का स्वरूप)


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॥ श्रीगणेशाय नमः ॥

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

श्रीवराहपुराण

ॐ नमो भगवते महावराहाय

भगवान् वराहके प्रति पृथ्वीका प्रश्न और भगवान्‌के उदरमें विश्वब्रह्माण्डका दर्शनकर भयभीत हुई पृथ्वीद्वारा उनकी स्तुति

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्॥
नमस्तस्मै वराहाय लीलयोद्धरते महीम्।
खुरमध्यगतो यस्य मेरुः खणखणायते॥
दंष्ट्राग्रेणोद्धता गौरुदधिपरिवृता पर्वतैर्निम्नगाभिः
साकं मृत्पिण्डवत्प्राग्बृहदुरुवपुषाऽनन्तरूपेण येन।
सोऽयं कंसासुरारिर्मुरनरकदशास्यान्तकृत्सर्वसंस्थः
कृष्णो विष्णुः सुरेशो नुदतु मम रिपूनादिदेवो वराहः॥

अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् वराह, नररत्न नरऋषि, उनकी लीला प्रकट करनेवाली भगवती सरस्वती और उसके वक्ता भगवान् व्यासको नमस्कार करके आसुरी सम्पत्तियोंका नाश करके अन्तःकरणपर विजय प्राप्त करानेवाले वराहपुराणका पाठ करना चाहिये।

जिनके लीलापूर्वक पृथ्वीका उद्धार करते समय उनके खुरोंमें फँसकर सुमेरु पर्वत खन-खन शब्द करता है, उन भगवान् वराहको नमस्कार है।

जिन अनन्तरूप भगवान् विष्णु (वराह)-ने प्राचीन कालमें समुद्रोंसे घिरी, वन-पर्वत एवं नदियोंसहित पृथ्वीको अत्यन्त विशाल शरीरके द्वारा अपनी दाढ़के अग्रभागपर मिट्टीके (छोटे-से) ढेलेकी भाँति उठा लिया था, वे कंस, मुर, नरक तथा रावण आदि असुरोंका अन्त करनेवाले कृष्ण एवं विष्णुरूपसे सबमें व्याप्त देवदेवेश्वर आदिदेव भगवान् वराह मेरी सभी बाधाओं (काम, क्रोध, लोभ आदि आध्यात्मिक शत्रुओं)-को नष्ट करें।

**सूतजी कहते हैं—**पूर्वकालमें जब सर्वव्यापी भगवान् नारायणने वराह-रूप धारण करके अपनी शक्तिद्वारा एकार्णवकी अनन्त जलराशिमें निमग्न पृथ्वीका उद्धार किया, उस समय पृथ्वीने उनसे पूछा।

**पृथ्वीने कहा—**प्रभो! आप प्रत्येक कल्पमें सृष्टिके आदिकालमें इसी प्रकार मेरा उद्धार करते रहते हैं; परंतु केशव! आपके स्वरूप एवं सृष्टिके प्रारम्भके विषयमें मैं आजतक न जान सकी। जब

१०
संक्षिप्तश्रीवराहपुराण
[ अध्याय १

वेद लुप्त हो गये थे, उस समय आप मत्स्यरूप धारण कर समुद्रमें प्रविष्ट हो गये थे और वहाँसे वेदोंका उद्धार करके आपने ब्रह्माको दे दिया था। मधुसूदन! इसके अतिरिक्त जब देवता और दानव एकत्र होकर समुद्रका मन्थन करने लगे, तब आपने कच्छपावतार ग्रहण करके मन्दराचल पर्वतको धारण किया था। भगवन्! आप सम्पूर्ण जगत्के स्वामी हैं। जब मैं जलमें डूब रही थी, तब आपने रसातलसे, जहाँ सब ओर जल-ही-जल था, अपनी एक दाढ़पर रखकर मेरा उद्धार किया है। इसके अतिरिक्त जब वरदानके प्रभावसे हिरण्यकशिपुको असीम अभिमान हो गया था और वह पृथ्वीपर भाँति-भाँतिके उपद्रव करने लगा था, उस समय वह आपके द्वारा ही मारा गया था। देवाधिदेव! प्राचीन कालमें आपने ही जमदग्निनन्दन परशुरामके रूपमें अवतीर्ण होकर मुझे क्षत्रियरहित कर दिया था। भगवन्! आपने क्षत्रियकुलमें दाशरथि श्रीरामके रूपमें अवतीर्ण होकर क्षत्रियोचित पराक्रमसे रावणको नष्ट कर दिया था तथा वामनरूपसे आपने ही बलिको बाँधा था। प्रभो! मुझे जलसे ऊपर उठाकर आप सृष्टिकी रचना किस प्रकार करते हैं तथा इसका क्या कारण है? आपकी इन लीलाओंके रहस्यको मैं कुछ भी नहीं जानती।

विभो! मुझे एक बार जलके ऊपर स्थापित करनेके अनन्तर आप किस प्रकार सृष्टिके पालनकी व्यवस्था करते हैं? आपके निरन्तर सुलभ रहनेका कौन-सा उपाय है? सृष्टिका किस प्रकार आरम्भ और अवसान होता है? चारों युगोंकी गणनाका कौन-सा प्रकार है तथा युगोंका क्रम किस प्रकार चलता है? महेश्वर! उन युगोंमें किस युगकी प्रधानता है तथा किस युगमें आप कौन-सी लीला किया करते हैं? यज्ञमें सदा संलग्न रहनेवाले कितने राजा हो चुके हैं और उनमेंसे किन-किनको सिद्धि सुलभ हुई है? प्रभो! आप मुझपर प्रसन्न हों और ये सब विषय संक्षेपसे बतानेकी कृपा करें।

पृथ्वीके ऐसा कहनेपर शूकररूपधारी भगवान् आदिवराह हँस पड़े। हँसते समय उनके उदरमें जगद्धात्री पृथ्वीको महर्षियोंसहित रुद्र, वसु, सिद्ध एवं देवताओंका समुदाय दीखने लगा। साथ ही उसने वहाँ अपने-अपने कर्तव्यपालनमें तत्पर सूर्य, चन्द्रमा, ग्रहों और सातों लोकोंको भी देखा। यह सब देखते ही भय एवं विस्मयसे पृथ्वीके सभी अङ्ग काँपने लगे। इस प्रकार पृथ्वीको भयभीत देखकर भगवान् वराहने अपना मुख बंद कर लिया। तब पृथ्वीने उनको चतुर्भुज रूप धारणकर महासागरमें शेषनागकी शय्यापर सोये देखा। उनकी नाभिसे कमल निकला हुआ था। फिर तो चार भुजाओंसे सुशोभित उन परमेश्वरको देखकर देवी पृथ्वीने हाथ जोड़ लिया और उनकी स्तुति करने लगी।

पृथ्वीने कहा— कमलनयन! आपके श्रीअङ्गोंमें पीताम्बर फहरा रहा है, आप स्मरण करते ही भक्तोंके पापोंका हरण करनेवाले हैं, आपको बारम्बार नमस्कार है। देवताओंके द्वेषी दैत्योंका दलन करनेवाले आप परमात्माको नमस्कार है। जो शेषनागकी शय्यापर शयन करते हैं, जिनके वक्षःस्थलपर लक्ष्मी शोभा पाती हैं तथा भक्तोंको मुक्ति प्रदान करना ही जिनका स्वभाव है, ऐसे सम्पूर्ण देवताओंके ईश्वर आप प्रभुको बारम्बार नमस्कार है। प्रभो! आपके हाथमें खड्ग, चक्र और शार्ङ्ग धनुष शोभा पाते हैं, आपपर जन्म एवं मृत्युका प्रभाव नहीं पड़ता तथा आपके नाभिकमलपर ब्रह्माका प्राकट्य हुआ है, ऐसे आप प्रभुके लिये बारम्बार नमस्कार है। जिनके अधर और करकमल

२-विभिन्न सर्गोंका वर्णन तथा देवर्षि नारदको वेदमाता सावित्रीका अद्भुत कन्याके रूपमें दर्शन होनेसे आश्चर्यकी प्राप्ति

अध्याय २ ] विभिन्न सर्गोंका वर्णन ११

लाल विद्रुममणिके समान सुशोभित होते हैं, उन जगदीश्वरके लिये नमस्कार है। भगवन्! मैं निरुपाय नारी आपकी शरणमें आयी हूँ, मेरी रक्षा करनेकी कृपा करें। जनार्दन! सघन नील अञ्जनके समान श्यामल आपके इस वराहविग्रहको देखकर मैं भयभीत हो गयी हूँ। इसके अतिरिक्त चराचर सम्पूर्ण जगत्को आपके शरीरमें देखकर भी मैं पुनः भयको प्राप्त हो रही हूँ। नाथ! अब आप मुझपर दया कीजिये। महाप्रभो! मेरी रक्षा आपकी कृपापर निर्भर है।

भगवान् केशव मेरे पैरोंकी, नारायण मेरे कटिभागकी तथा माधव दोनों जङ्घाओंकी रक्षा करें। भगवान् गोविन्द गुह्याङ्गकी रक्षा करें। विष्णु मेरी नाभिकी तथा मधुसूदन उदरकी रक्षा करें। भगवान् वामन वक्षःस्थल एवं हृदयकी रक्षा करें। लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु मेरे कण्ठकी, हृषीकेश मुखकी, पद्मनाभ नेत्रोंकी तथा दामोदर मस्तककी रक्षा करें।

इस प्रकार भगवान् श्रीहरिके नामोंका अपने अङ्गोंमें न्यास करके पृथ्वीदेवी 'भगवन्! विष्णो! आपको नमस्कार है' ऐसा कहकर मौन हो गयीं।

[ अध्याय १ ]


विभिन्न सर्गोंका वर्णन तथा देवर्षि नारदको वेदमाता सावित्रीका अद्भुत कन्याके रूपमें दर्शन होनेसे आश्चर्यकी प्राप्ति

सूतजी कहते हैं—सभी जीवधारियोंके शरीरोंमें आत्मारूपसे स्थित भगवान् श्रीहरि पृथ्वीकी भक्तिसे परम संतुष्ट हो गये। उन्होंने वराह-रूप धारण करके पृथ्वीको अपनी योगमायाका दर्शन कराया और फिर उसी रूपमें स्थित रहकर बोले—'सुश्रोणि! तुम्हारा प्रश्न यद्यपि बहुत कठिन है एवं यह पुरातन इतिहासका विषय है, तथापि मैं सभी शास्त्रोंसे सम्मत इस विषयका प्रतिपादन करता हूँ। पृथ्विदेवि! साधारणतः सभी पुराणोंमें यह प्रसङ्ग आया है।'

भगवान् वराहने कहा—सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित—जहाँ ये पाँच लक्षण विद्यमान हों, उसे पुराण समझना चाहिये। वरानने! पुराणोंमें सर्ग अर्थात् सृष्टिका स्थान प्रथम है। अतः मैं पहले उसीका वर्णन करता हूँ। इसके आरम्भसे ही देवताओं और राजाओंके चरित्रका ज्ञान होता है। परमात्मा सनातन हैं। उनका कभी किसी कालमें नाश नहीं होता। वे परमात्मा सृष्टिकी इच्छासे चार भागोंमें विभक्त हुए, ऐसा वेदज्ञ पुरुष जानते हैं। सृष्टिके आदिकालमें सर्वप्रथम परमात्मासे अहंतत्त्व, फिर आकाश आदि पञ्च महाभूत उत्पन्न हुए। उसके पश्चात् महत्तत्त्व प्रकट हुआ और फिर अणुरूपा प्रकृति और इसके बाद समष्टि बुद्धिका प्रादुर्भाव हुआ। सत्त्व, रज और तम—इन तीन गुणोंसे युक्त होकर वह बुद्धि पृथक्-पृथक् तीन प्रकारके भेदोंमें विभक्त हो गयी। इस गुणत्रयमेंसे तमोगुणका संयोग प्राप्त करके महद्ब्रह्मका प्रादुर्भाव हुआ, इसको सभी तत्त्वज्ञ प्रधान अर्थात् प्रकृति कहते हैं। इस प्रकृतिसे भी क्षेत्रज्ञ अधिक महिमायुक्त है। उस परब्रह्मसे सत्त्वादि गुण, गुणोंसे आकाश आदि तन्मात्राएँ और फिर इन्द्रियोंका समुदाय बना। इस प्रकार जगत्‌की सृष्टि व्यवस्थित हुई। भद्रे! पाँच महाभूतोंसे स्वयं मैंने स्थूल शरीरका निर्माण किया। देवि! पहले केवल शून्य था। फिर उसमें शब्दकी उत्पत्ति हुई। शब्दसे आकाश हुआ। आकाशसे वायु, वायुसे तेज एवं तेजसे जलकी उत्पत्ति हुई। इसके बाद प्राणियोंको अपने ऊपर

१२संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय २

धारण करनेके लिये तुम्हारी—(पृथिवीकी) रचना हुई।

पृथ्वी और जलका संयोग होनेपर बुद्बुदाकार कलल बना और वही अण्डेके आकारमें परिणत हो गया। उसके बढ़ जानेपर मेरा जलमय रूप दृष्टिगोचर हुआ। मेरे इस रूपको स्वयं मैंने ही बनाया था। इस प्रकार नार अर्थात् जलकी सृष्टि करके मैं उसीमें निवास करने लगा। इसीसे मेरा नाम 'नारायण' हुआ। वर्तमान कल्पके समान ही मैं प्रत्येक कल्पमें जलमें शयन करता हूँ और मेरे सोते समय सदैव मेरी नाभिसे इसी प्रकार कमल उत्पन्न होता है, जैसा कि आज तुम देख रही हो। देवि! ऐसी स्थितिमें मेरे नाभिकमलपर चतुर्मुख ब्रह्मा उत्पन्न हुए। तब मैंने उनसे कहा—'महामते! तुम प्रजाकी रचना करो।' ऐसा कहकर मैं अन्तर्धान हो गया और ब्रह्मा भी सृष्टिरचनाके चिन्तनमें लग गये। वसुन्धरे! इस प्रकार चिन्तन करते हुए ब्रह्माको जब कोई मार्ग नहीं सूझ पड़ा, तो फिर उन अव्यक्तजन्माके मनमें क्रोध उत्पन्न हुआ। उनके इस क्रोधके परिणामस्वरूप एक बालकका प्रादुर्भाव हुआ। जब उस बालकने रोना प्रारम्भ किया, तब अव्यक्तरूप ब्रह्माने उसे रोनेसे मना किया। इसपर उस बालकने कहा—'मेरा नाम तो बता दीजिये।' तब ब्रह्माने रोनेके कारण उसका नाम 'रुद्र' रख दिया। शुभे! उस बालकसे भी ब्रह्माने कहा—'लोकोंकी रचना करो।' परंतु इस कार्यमें अपनेको असमर्थ जानकर उस बालकने जलमें निमग्न होकर तप करनेका निश्चय किया।

उस रुद्र नामक बालकके तपस्याके लिये जलमें निमग्न हो जानेपर ब्रह्माने फिर दूसरे प्रजापतिको उत्पन्न किया। दाहिने अँगूठेसे उन्होंने प्रजापतिकी तथा बायें अँगूठेसे प्रजापतिके लिये पत्नीकी सृष्टि की। प्रजापतिने उस स्त्रीसे स्वायम्भुव मनुको उत्पन्न किया। इस प्रकार पूर्वकालमें ब्रह्माने स्वायम्भुव मनुके द्वारा प्रजाओंकी वृद्धि की।

पृथ्वी बोली— देवेश्वर! प्रथम सृष्टिका और विस्तारसे वर्णन करनेकी कृपा करें तथा नारायण ब्रह्मारूपसे कैसे विख्यात हुए? मुझे यह सब भी बतलानेकी कृपा करें।

वराह भगवान् कहते हैं— देवि पृथ्वि! नारायणने ब्रह्मारूपसे जिस प्रकार प्रजाओंकी सृष्टि की, उसे मैं विस्तृत रूपसे कहता हूँ, सुनो। शुभे! पिछले कल्पका अन्त हो जानेपर रात्रि व्याप्त हो गयी। भगवान् श्रीहरि उस समय सो गये। प्राणोंका नितान्त अभाव हो गया। फिर जगनेपर उनको यह जगत् शून्य दिखायी पड़ा। भगवान् नारायण दूसरोंके लिये अचिन्त्य हैं। वे पूर्वजोंके भी पूर्वज, ब्रह्मस्वरूप, अनादि और सबके स्रष्टा हैं। ब्रह्माका रूप धारण करनेवाले वे परम प्रभु जगत्की उत्पत्ति और प्रलयकर्ता हैं। उन नारायणके विषयमें यह श्लोक कहा जाता है—

आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः।
अयनं तस्य ताः पूर्वं ततो नारायणः स्मृतः॥

पुरुषोत्तम नरसे उत्पन्न होनेके कारण जलको 'नार' कहा जाता है, क्योंकि जल भी नार अर्थात् पुरुषोत्तम परमात्मासे उत्पन्न हुआ है। सृष्टिके पूर्व वह नार ही भगवान् हरिका अयन—निवास रहा, अतएव उनकी नारायण संज्ञा हो गयी। फिर पूर्व-कल्पोंकी भाँति उन श्रीहरिके मनमें सृष्टिरचनाका संकल्प उदित हुआ। तब उनसे बुद्धिशून्य तमोमयी सृष्टि उत्पन्न हुई। पहले उन परमात्मासे तम, मोह, महामोह, तामिस्र और अन्धतामिस्र—यह पाँच पर्वोंवाली अविद्या उत्पन्न हुई। उनके फिर चिन्तन करनेपर तमोगुणप्रधान चेतनारहित जड़ (वृक्ष, गुल्म, लता, तृण और पर्वत)—रूप पाँच प्रकारकी सृष्टि उत्पन्न हुई। सृष्टि-रचनाके रहस्यको जाननेवाले विद्वान् इसे मुख्य सर्ग कहते हैं। फिर