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वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

१४८- मृन्मयी एवं ताम्र-प्रतिमाओंकी प्रतिष्ठा-विधि

३२२ संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय १७८-१७१

भगवान् वराह कहते हैं— वसुंधरे! मन, वाणी अथवा कर्म किसी प्रकारसे भी पाप-कर्ममें रुचि रखना अपराध है। दन्तधावन न करने, राजान्न खाने, शवस्पर्श करने, सूतकवाले व्यक्तिका जल ग्रहण करने एवं उसका स्पर्श तथा मल, मूत्र, आदि क्रियाओंसे भी अपराध बन जाते हैं। अवाच्यवाणी बोलना, अभक्ष्य-भक्षण करना, पिण्याक (हींग)-को भोजनमें सम्मिलित करना, दूसरेके मलिन वस्त्र, नीले रंगवाला वस्त्र धारण करना, गुरुसे असत्य भाषण, पतित व्यक्तिका अन्न खाना तथा भोजन न देनेका भय उत्पन्न करना—ये सब सेवापराध हैं। उत्तम अन्न स्वयं खा लेना, बत्तक आदिका मांस खाना और देव-मन्दिरमें जूता पहनकर जाना भी अपराध है। देवताकी आराधनामें जिस फूलको शास्त्रमें निषिद्ध माना गया है, उसे काममें लेना, निर्माल्यको विग्रह (मूर्ति)-परसे हटाये बिना ही अस्त-व्यस्त होकर अँधेरेमें भगवान्‌की पूजा करना भी अपराध है। मदिरा पीना, अन्धकारमें इष्टदेवताको जगाना, भगवान्‌की पूजा एवं प्रणाम न करके सांसारिक काममें प्रवृत्त हो जाना—ये सभी अपराध हैं। वसुधे! इस प्रकारके तैंतीस अपराधोंको मैंने स्पष्ट कर दिया। इन अपराधोंसे युक्त पुरुष परम प्रभु श्रीहरिका दर्शन नहीं पा सकता। यदि वह दूर रहकर भी पूजा एवं नमस्कार करे तो उसका वह कर्म राक्षसी माना जाता है।

क्रमशः इनकी शुद्धिका प्रकार यह है—मैले वस्त्रसे दूषित व्यक्ति एक रात, दो रात अथवा तीन रातोंतक वस्त्र पहने ही स्नान करे और पञ्चगव्य पिये तो उसकी शुद्धि हो जाती है। नीला वस्त्र पहननेके पापसे बचनेके लिये मानव गोमयद्वारा अपने शरीरको भलीभाँति मले और 'प्राजापत्य' व्रत करे तो वह पवित्र हो जाता है। गुरुके प्रति बने हुए पापसे मुक्तिके लिये दो 'चान्द्रायण' व्रत करनेका विधान है। लोग पतितका अन्न खा लेनेपर 'चान्द्रायण'* और 'पराक' व्रत† करनेसे शुद्ध होते हैं। जूता पहनकर मन्दिरमें जानेवाला मानव 'कृच्छ्रपाद' व्रत और दो दिन उपवास करे। फूल तथा नैवेद्यके अभावमें भी पञ्चामृतसे भगवान्‌का स्नान एवं स्पर्श करके नमस्कार करनेकी विधि है। मदिरा-पानके पापसे शुद्ध होनेके लिये ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यको चाहिये कि चार 'चान्द्रायण' व्रत तथा बारह वर्षोंतक तीन 'प्राजापत्य' व्रत करे।

अथवा 'सौकरवक्षेत्र'में जाकर उपवास एवं गङ्गामें स्नान करे। उसके प्रभावसे प्राणी शुद्ध हो सकता है। ऐसे ही मथुरामें भी स्नान-उपवास करनेसे शुद्धि सम्भव है। जो मनुष्य इन दोनों तीर्थोंका उक्त प्रकारसे एक बार भी सेवन करता है, वह अनेक जन्मोंके किये हुए पापोंसे मुक्त हो जाता है। इन तीर्थोंमें स्नान, जलपान तथा भगवान्‌के ध्यान-धारणा, कीर्तन, मनन-श्रवण एवं दर्शन करनेसे भी पातक पलायन कर जाते हैं।

**पृथ्वीने पूछा—**सुरेश्वर! मथुरा और सूकर—ये दोनों ही तीर्थ आपको अधिक प्रिय हैं। पर यदि इनसे भी बढ़कर कोई अन्य तीर्थ हो तो अब उसे बतानेकी कृपा कीजिये।

**भगवान् वराह कहते हैं—**वसुधे! छोटी-


* चान्द्रायण-व्रतके अनेक भेद हैं, जैसे 'पिपीलिका', 'यवमध्य', 'शिशुचान्द्रायण' आदि। शुक्लपक्षकी प्रतिपदासे ग्रासवृद्धिपूर्वक अमावास्याको सर्वथा उपवास रहना 'यवमध्य' सर्वोत्तम चान्द्रायण है।
† १२ दिनोंका सर्वथा उपवास 'पराकव्रत' है। यतात्मनोऽप्रमत्तस्य द्वादशाहमभोजनम्। पराको नाम कृच्छ्रोऽयं सर्वपापापनोदनः॥ (मनु० ११। २१५)

अध्याय १८० ] श्राद्धसे अगस्तिका उद्धार, श्राद्ध-विधि ३२३

छोटी नदियोंसे लेकर समुद्रपर्यन्त पृथ्वीपर जितने तीर्थ हैं, उन सबमें 'कुब्जाम्रक' तीर्थ श्रेष्ठ माना जाता है। मेरी श्रद्धासे सम्पन्न सत्पुरुष सदा उनकी प्रशंसा करते हैं। कुब्जाम्रकसे भी कोटिगुना अधिक परम गुह्य 'सौकरव' तीर्थ है। एक समयकी बात है—मार्गशीर्षके शुक्ल पक्षकी द्वादशी तिथिको मैं 'सितवैष्णव' तीर्थमें गया। वहाँ पुराणोंमें श्रेष्ठ एक 'गङ्गासागरिक' नामका पुराण देखा है। इसमें मेरे मथुरामण्डलके तीर्थोंकी अत्यन्त गुह्य महिमा वर्णित है। 'सिततीर्थसे' परार्द्धगुना फल यहाँ सुलभ होता है—इसमें कोई संशय नहीं है। 'कुब्जाम्रक' प्रभृति समस्त तीर्थोंमें भ्रमण करनेके पश्चात् मैं मथुरामें आया और एक स्थानपर बैठ गया। मेरे उस स्थानका नाम 'विश्रान्तितीर्थ' पड़ गया। वह स्थान गोपनीयोंमें भी परम गोपनीय है। वहाँ स्नान करनेसे परम उत्तम फल मिलता है। गतिका अन्वेषण करनेवाले व्यक्तियोंके लिये मथुरा परम गति है। मथुरामें विशेष करके 'कुब्जाम्रक' और 'सौकर' क्षेत्रकी महिमा है। सांख्ययोग और कर्मयोगके अनुष्ठानके बिना भी इन तीर्थोंकी कृपासे मानव मुक्त हो जाता है, इसमें कोई संशय नहीं है। योगसे सम्पन्न विद्वान् ब्राह्मणके लिये जो गति निश्चित है, वही गति मथुरामें प्राण-त्याग करनेसे साधारण व्यक्तिको भी प्राप्त हो जाती है। सुव्रते! वस्तुतः मथुरासे उत्तम न कोई दूसरा तीर्थ है और न भगवान् केशवसे श्रेष्ठ कोई देवता है।

[ अध्याय १७८-१७९]


श्राद्धसे अगस्तिका उद्धार, श्राद्ध-विधि तथा 'ध्रुवतीर्थ' की महिमा

भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे! अब पितरोंसे सम्बद्ध एक दूसरा प्रसङ्ग कहता हूँ, उसे सुनो। मथुरापुरीमें पहले एक धार्मिक एवं शूर-वीर राजा थे, जिनका नाम चन्द्रसेन था। उनकी दो सौ रानियाँ थीं, जिनमें 'चन्द्रप्रभा' सबसे गुणवती थी, उसके सौ दासियाँ थीं, जिनमें एकका नाम 'प्रभावती' था। उस दासीके परिवारके पुरुष सदाचार विहीन थे। सभी मरकर दोषके कारण नरकयातनामें पड़ गये; क्योंकि उनके कुलमें एक वर्णसंकर उत्पन्न हो गया था।

देवि! एक समय वे पितर 'ध्रुवतीर्थ' में आये, जिनपर एक त्रिकालदर्शी ऋषिकी दृष्टि पड़ गयी। इनमें कुछ दिव्य रूपवाले पितर आकाश-गमनकी शक्तिसे युक्त श्रेष्ठ वाहनोंपर चढ़कर आये और अपने वंशजोंको आशीर्वाद देकर चले गये। कुछ दूसरे पितृगण जो 'ध्रुवतीर्थ' में आये, उनके श्राद्ध न होनेसे पेटमें झुर्रियाँ पड़ गयी थीं। अतः वे पुत्रोंको शाप देकर चले गये। त्रिकालज्ञ मुनि यह सब दृश्य देख रहे थे। जब पितृगण चले गये और वे मुनि अकेले आश्रममें रह गये तो एक सूक्ष्म शरीरधारी पितरने उनसे कहा—'मुने! वर्णसंकरसम्बन्धी दोषके कारण मुझे नरकमें स्थान मिला है। मैं सौ वर्षोंसे आशारूपी रस्सियोंसे बँधा प्रतीक्षा करता रहा; पर अब निराश होकर आपके पास आया हूँ। तीनों तापोंसे अत्यन्त घबराकर और विवश होकर मैं आपकी शरण आया हूँ। जिनके पुत्रोंने पिण्डदान एवं तर्पण किया है, वे पितर हृष्ट-पुष्ट होकर आकाशगमनकी शक्तिसे स्वर्गमें चले गये हैं। किंतु मैं बलहीन व्यक्ति कहीं भी नहीं जा सकता हूँ। जिनकी संतान अपने बाल-बच्चोंके साथ सदा सम्पन्न है, वे उनके द्वारा स्वधासे सुपूजित होकर परम गतिके अधिकारी होते हैं। त्रिकालज्ञ मुनिवर! आपको दिव्य दृष्टि सुलभ है। उसके प्रभावसे

३२४संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १८०

आपने जिन पितरोंको स्वर्गमें जाते हुए देखा है, वे सभी आज राजा चन्द्रसेनके द्वारा सत्कृत हुए हैं।'

पितरने कहा—'जो पितरोंके लिये श्राद्ध करता है, उसका उत्तम फल निश्चित है, किंतु न करनेसे विपरीत फल सामने आता है और पितर नरकके भागी हो जाते हैं; इसमें कुछ कारण है, वह भी मैं आपको बताता हूँ; सुनें। श्राद्धसम्बन्धी जो द्रव्य उचित देश, काल और पात्रको नहीं दिया गया, विधिकी रक्षा न हुई, साथमें दक्षिणा न दी गयी तो वह प्रत्यवायका कारण हो जाता है। जो श्राद्ध श्रद्धाके साथ सम्पन्न नहीं हुआ, जिसपर दुष्ट प्राणीकी दृष्टि पड़ गयी, जिसमें तिल और कुशाका अभाव रहा एवं मन्त्र भी नहीं पढ़े गये, उस श्राद्धको असुर ग्रहण कर लेते हैं। प्राचीन समयसे ही भगवान् वामनने ऐसे श्राद्धका अधिकारी बलिको बना रखा है। ऐसे ही दशरथनन्दन भगवान् रामके द्वारा अपने गणोंके साथ क्रूर रावण जब दिवंगत हो गया तो उन त्रिभुवनभर्ता श्रीरामने कुछ ऐसे श्राद्धोंका फल त्रिजटाको भी दे दिया था। भगवान् राम जब भगवती सीताके साथ बैठे थे, सीताने उनसे कहा—'त्रिजटा आपमें भक्ति रखती थी। सीताजीकी बात सुनकर श्रीराम प्रसन्न हो गये।' अतः उन परम प्रभुने उस राक्षसीको यह वर दिया—'त्रिजटे! जिस श्राद्ध करनेवाले व्यक्तिके घर श्राद्धकी उत्तम हविष् पदार्थ आदि सामग्रियाँ न हों, विधि और पात्र उचित रहनेपर भी यदि श्राद्ध करते समय क्रोध आ गया हो तथा पाक्षिक, मासिक श्राद्ध उचित समयपर सम्पन्न न हों एवं दक्षिणा भी न दी जाय तो उसका फल मैं तुम्हें देता हूँ।'

इसी प्रकार एक बार भगवान् शंकरने नागराज वासुकिकी भक्तिसे प्रसन्न होकर उसे वर देते हुए कहा था—'नागराज! जिस मनुष्यने वार्षिक श्राद्ध करनेके पूर्व भगवान् श्रीहरिसे आज्ञा प्राप्त नहीं की और श्राद्ध-क्रिया सम्पन्न कर ली, यज्ञके अवसरपर उचित दक्षिणा न दी, देवता एवं ब्राह्मणके सामने देनेकी प्रतिज्ञा करके उसे पूरा नहीं किया, श्राद्धमें बिना मन्त्र पढ़े ही क्रियाएँ कर दीं—ऐसे यज्ञों एवं श्राद्धोंका सम्पूर्ण फल मैं तुम्हें अर्पित करता हूँ।' मुने! ये सभी बातें पुराणों एवं इतिहासोंमें वर्णित हैं।

'मुने! जिन्हें आपने दयनीय दशामें देखा था, उनके श्राद्ध, अवैध रूपमें ही अनुष्ठित हुए हैं। अतः उसका उत्तम फल इन पितरोंको प्राप्त नहीं हो सका है। यही कारण है कि ये नंग-धड़ंग कालक्षेप कर रहे हैं। इनके पुत्रोंने जो श्राद्ध-क्रिया की थी, उसमें त्रुटि रह गयी थी। इसी लिये पितृगण गाथा गाते हैं कि 'क्या हमारे कुलमें ऐसा कोई व्यक्ति जन्म लेगा, जो प्रभूत जलवाली नदियोंमें 'तृप्यध्वं०, उदीरतां०, आयन्तु०' इत्यादि मन्त्रोंसे हमारा तर्पण एवं उनके तटपर श्राद्ध करेगा। महाप्राज्ञ! आपने मुझसे जो पूछा था, संक्षेपमें उसका यही उत्तर है।'

वसुंधरे! यह सब सुनकर वे ऋषि राजा चन्द्रसेनके पास पहुँचे। उन ऋषिको देखकर राजा सिंहासनसे उठकर पृथ्वीपर खड़े होकर उनके चरणोंमें मस्तक झुकाकर कहा—'मुनिवर! आप मेरे घरपर पधारे, इससे मैं धन्य एवं कृतार्थ हो गया। आपके यहाँ आ जानेसे मेरा जन्म सफल हो गया। मुने! पाद्य, अर्घ्य, मधुपर्क और गौ—ये सभी वस्तुएँ आपकी सेवामें समर्पित हैं। इन्हें आप स्वीकार करें, जिससे मुझे पूर्ण संतोष हो जाय।'

देवि! उस समय राजा चन्द्रसेनके दिये हुए अर्घ्य आदिको स्वीकार करके त्रिकालज्ञ मुनिने