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सर्वकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

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पृष्ठ 88

अध्याय ३२ ] त्रयोदशी तिथि एवं धर्मकी उत्पत्तिका वर्णन ७७


बैलकी थी। फिर उस पुरुषको देखकर परम प्रभुने कहा—‘साधो ! तुम इन प्रजाओंकी रक्षा करो। मेरे द्वारा तुम जगत्में प्रधान बना दिये जाते हो।’

भगवान् नारायणकी आज्ञासे वह पुरुष वैसा ही हो गया। सत्ययुगमें उसके सत्य, शौच, तप और दान—ये चार पैर थे, त्रेतामें तीन तथा द्वापरमें दो। कलियुगमें वह दानरूपी एक पैरसे ही प्रजाओंका पालन करने लगा। ब्राह्मणोंके लिये उसने अध्ययन-अध्यापन एवं यजन-याजनादि छः रूप बनाये। क्षत्रियोंके लिये दान, यजन एवं अध्ययन—इन तीन रूपोंसे, वैश्योंके लिये दो रूपोंसे तथा शूद्रोंके लिये केवल एक सेवारूपसे ही सम्पन्न होकर वह सर्वत्र विराजने लगा। यह शक्तिशाली पुरुष सम्पूर्ण द्वीपों तथा तलातलोंमें व्याप्त हो गया। प्रकारान्तरसे द्रव्य, गुण, क्रिया और जाति—ये चार इसके पैर कहे गये हैं। वेदमें कहा गया है—संहिता, पद और क्रम—ये तीन उसके सींग हैं। आदि और अन्तमें स्थान पाये हुए दो सिरोंसे वह शोभा पाता है। उसके सात हाथ हैं। उदात्त, अनुदात्त और स्वरित—इन तीन स्वरोंसे वह सदा बद्ध रहता है। इस प्रकारसे वह धर्म व्यवस्थित हुआ।

राजन् ! कुछ समयके बाद उस धर्मको विचित्र कर्म करनेवाले चन्द्रमाके कारण महान् दुःख हुआ। बृहस्पति चन्द्रमाके भाई हैं। चन्द्रमाके मनमें बृहस्पतिकी स्त्री ताराको ग्रहण करनेकी इच्छा जग उठी। इस निन्दित कर्मसे धर्मका मन उद्विग्न हो गया। अतः वह वहाँसे चला और एक गहन वनमें पहुँचकर वहीं रहने लगा। धर्मके वनमें चले जानेपर सम्पूर्ण देवता तथा दानवोंके सैनिक धर्महीन हो गये। फिर देवता दानवोंको मारनेके लिये घूमने लगे तथा वैसे ही दानवोंका भी देवताओंके घरपर चक्कर लगाना आरम्भ हो गया। राजन् ! उस समय धर्मके न रहनेसे सभी मर्यादाएँ छिन्न-भिन्न हो गयीं। महाभाग ! चन्द्रमाके दोषसे देवता और दानव—सभी परस्पर द्वेषके भाजन बन गये। उन्होंने अनेक प्रकारके आयुधोंको हाथमें ले लिया और वे परस्पर युद्ध करने लगे। उस संग्रामका कारण केवल स्त्री थी। नारदजी बड़े विनोदी हैं। दानवोंके साथ लड़ते हुए क्रोधी देवताओंको देखकर वे तुरंत अपने पिता ब्रह्माजीके पास गये और इसकी सूचना दी। ब्रह्माजी सम्पूर्ण प्राणियोंके पितामह हैं। अतः हंसपर आरूढ़ हो युद्धस्थलमें जाकर उन्होंने सबको मना किया। फिर उन्होंने उनसे पूछा—‘इस समय तुमलोगोंका यह युद्ध किसलिये हो रहा है ?’ तब उन सबने उत्तर दिया—‘भगवन् ! यह चन्द्रमा ही सभी अनर्थोंका कारण है। यह अपनी बुद्धिसे इस लड़केको अपना बताता है। इस दूषित कर्मसे दुःखी होनेके कारण धर्म गहन वनमें जाकर निवास कर रहे हैं।’ तब ब्रह्माजीने उसी क्षण देवताओं और दानवोंको साथ लिया तथा वनकी ओर चल पड़े। वहाँ जाकर देखा कि धर्म वृषभका वेष बनाकर चार पैरोंसे विराजमान हैं। चन्द्रमाके समान सफेद उनके सींग हैं और वे इधर-उधर विचर रहे हैं। फिर ब्रह्माजीने उपस्थित देवताओंसे कहा—

ब्रह्माजी बोले— ‘देवताओ ! यह मेरा प्रथम पुत्र है। इस महामुनिको लोग धर्म कहते हैं। भाईकी भार्यासे अवैध राग करनेवाले चन्द्रमाके व्यवहारसे इसे अत्यन्त व्यथा हो रही है। अतः तुम सभी देवता और दानव अब इसे संतुष्ट करनेका प्रयत्न करो, जिसके फलस्वरूप पुनः सम्पूर्ण सुरों एवं असुरोंकी सम स्थिति हो जाय।’ राजन् ! उस समय ब्रह्माजीके वचनसे देवताओं और दानवोंको धर्मकी बातें विदित हो गयीं। उन्हें बड़ा हर्ष हुआ। अतएव सबलोग चन्द्रमाके समान स्वच्छ वर्णवाले धर्मकी स्तुति करनेमें तत्पर हो गये।