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वापी-कूप-तड़ाग-प्रतिष्ठा पद्धति (प्राचीन भारतीय बावड़ी, कूप व जलाशय निर्माण स्थापत्य)

Vapi Kupa Tadaga Pratishtha Paddhati

प्राचीन भारतीय जल-स्थापत्य परम्परा द्वारा

DevanagariSanskritpublished30 पृष्ठ

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शतिर्ब्राह्मणान्भोजयेत्॥ अशक्तस्तु त्रयोदश त्रिंशतः
विधिः एषः मुख्य कल्पः॥ इति श्री वापि कूप तडागाना
म्देवतायतन प्रतिष्ठा विधिः॥१॥ अथ सामग्री प्रथम व
र ए सामग्री आसन लोटे धोति गोमुखी माला साफे सुपारी
कुंकुम हरिद्रा कलश नाली परोता फूल के एग सर्वोषधी॥
१५ से प्रस्त धूप दीप फलम् होम दिन की सामग्री पयधौ
एग सपाद शत जप के दशांश हवन मांधौ एप व तिल १. सेर तंदुल
५ सेर सर्करा १॥ सेर घी साढे १॥ सेर इंद्रपव भोजपत्र मेवा
१ कटोरी छायापात्र की कुशा पत्ते फूल वंदरवाल रेता पंच रंग॥
सौवर्ण रौप्य की प्रतिमा लक्ष्मीनारायण की १ अथ जल च
रारी सुवर्ण और चांदी की मत्स्य मछी कच्छप कूरम और कुलीर
मंडुक मिंडक ताम्रपत्रां वे के॥ शिशुमार लोहि के लोहे

[Header] नषे ५ देवमेकंचमातुलं

⁕ आदित्यपुराणे ॥ सेतुबंधरता ये च तीर्थगोचरता नये तडाग-
कूपकर्त्तारो मुच्यंते कृच्छ्रयातनात् ॥ कूपारामतडागेषु देव-
तायतनेषु च । पुनःसंस्कारकर्त्ता च लभते मूलजं फलम् ॥
४ नंदीपुराणे ॥ यो वापीमथ वा कूपं यदि तोयविवर्जिते । खनपे-
त्स नरो याति स्वर्गे प्रोक्तं शतंसमाः ॥ देवं-एकंचमातुलं तडा-
गुद्धिर्जितस्तथा । तडागकर्त्ता वसति स्वर्णे भूत्वा चतुष्प-
थम् ॥ यत्र विप्रो थ गौरेका पीयते सलिलं क्वचित् ॥
तडागेनादशंकृत्वा स्वर्गे शक्रानुगं वसेत् ॥ ⁕ अथ द्रुमे-
ष्वश्वत्थमेकं न्यग्रोधमेकं दश चिंचिरीका कपित्थ-
कंपिचूमंदमेकं च पंचाम्रवापिनरकं न पश्येत् ⁕
विल्वामलकित्रयंच पंचानं तु कोष्ठरुहा दश पत्रैः पुत्रैः क-
षामेवरंभूमिरूता पंचतु कोष्ठरुहा ॥ सहस्रमलोतरशतपत्रै-
लैर्वापिकरोति पितृतर्पणम्हा ॥

प्र० १५
समाप्त
212
तोरण नाम वंदरवाल को है धजा पताका पू० पत्र १ से पूत कहैं ॥
लिंग को पूजन उत्सर्ग प्रकृत गंगा द्वितीय जल गेरो पत्र ११ है ॥
आराम प्रतिष्ठा में इंद्र का मंत्र १ और वरुण गायत्री २ और वायु मंत्र ३ यह ३ मंत्र जपे ॥
॥ इति श्री वापी कूप तडाग राम नाम प्रतिष्ठा विम मकर म ॥ धिः ॥
आराम प्रतिष्ठा पत्र
इस प्रतिष्ठा में कर्ण वेध न० और अंजन यह कृत्य पत्र १३५ पर है ॥
तर्पण पत्र ८ पर ह यजमान से कराना
अंग जल गेरे रो पत्र १० पर है
श्री० प्र० क्र० ११
सं० १९४८
नाग का रो पत्र ८५० नगर देवल होरेण ॥
र्गे जला पण का उसर्ग करा व पत्र २० पर है
इंद्र का मंत्र लच्छी दरी में पत्र २१ पर है
१ ब्रम्हा गायत्री
२ गणेश गायत्री
३ वरुण का मंत्र
४ वायु मंत्र
यह ४ मंत्र प्रवृक्ष जपए चाहैं
ये कूप प्रतिष्ठा मे

बायाँ पार्श्व (Vertical text on the left margin):
१५ ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षँ शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वँ शान्तिः...

दायाँ पार्श्व (Vertical text on the right margin):
ॐ नमो वो देवा अतिथयः प्रचेतसो मन्द्राः सुजिह्वा उप संधिनः प्रति मे...
वास्तोष्पते प्रति जानीह्यस्मान्त्स्वावेशो अनमीवो भवा नः...
१५

की प्रतिमा १ नौसव सांतपर्णार्थ १ ताम्र कलश १ रुद्र क-
लश १ वास्तु कलश १ खाद्य यव का समिधा ? आज्य सेर १ होमा-
र्थे दधी मधु क्षीर दुर्वा कुशा चंदन अक्षत लडुल १ मसूरी की
दाल ३ सेर चणे की दाल २ मुंग सेर २ गुड ५ सेर तिल ३ सेर
सर्वतोभद्र मंडलार्थ रंग अक्षतो के भरने वाला छत्री कुंगु
१ पान सुपारी २० नालीयेर १ कुंकुम ॥ सूत्र त्रिगुण वेष्टनो सुत
की आटि १ पीली करंडी १ ॥ गोदान रथ दान १ अश्व दान १ महि-
षी दान १ ॥ शय्या दान १ ॥ उमामहेश्वर दान १ भूरसी दान १ ॥ वास्तु पीठे
वस्त्र गज ४ नवग्रह पीठे वस्त्र गज ३ ताम्र कलश २ रुद्र
कुंभ १ मंगल कलश १ वास्तु प्रतिमा सुवर्ण की १ रौप्य की १ स-
मिध पलाश जु सेर की १८ ॥ वंदरवाल आम्र की कदली सं-
भ ४ ध्वजा १० पताका १ कुल्हड ३ घड ५ पकांसा का १ दुध को
१६ खरवा घराल