वापी-कूप-तड़ाग-प्रतिष्ठा पद्धति (प्राचीन भारतीय बावड़ी, कूप व जलाशय निर्माण स्थापत्य)
Vapi Kupa Tadaga Pratishtha Paddhati
प्राचीन भारतीय जल-स्थापत्य परम्परा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबानो य पावे दसामसह घेरेन्ति त पा पुरदधः स्वसावे पकान्न पंचामृ
तमेतद्वलिना॥ इति दिक्पालेभ्यो ऽर्धो बलिं दत्वादिक्पालेभ्यो नमस्कुर्या
त्॥ १ ॥ अथ ध्वजारोपणविधिर्लिख्यते॥ प्रथात संप्रवक्षामि ध्वजोरो
पणका विधीः को मंत्र को संस्कारः का क्रिया पूजनं महत्॥ १ ॥ काहुदण्ड
प्रमाणानिविस्तार षोऽशंगुलम् षष्टांकुप्यो द्विहस्तंच विस्तार चक्रैकस्त
वंशः पीतारक्ता तथा श्यामा नीला शुक्ला च तस्य च हरिता पांडुरा चैव कौ
सुंभाहे वै कारयेत् ३॥ ध्वजा दशविधा ने त इंद्रादि चक्रमेण तु॥ ० ॥ अथ
ध्वजाऽऽवाहनम्॥ पूर्वस्यां दिशि यस्य ध्वजा नाम जपाख्या व जरह
स्तातू सा देवी इंद्रासिव हमंगलमुर तो चैवतु सर्वेशो प्रेततेज विमोहि
ता॥ ओं त्रातारमिंद्रमिति मंत्रेणऽऽवाहयेत्॥ ॐ आग्रेय्यांदिशियत्तस्य
विजयंती च लेप्सिता शक्तिहस्ता तु सा देवी कौमारी वह मंगला रक्त
श्वेतश्च पत्त्या मवातञ्च विमोहिता कृणुष्वेति मंत्रेणऽऽग्नेय्यांदिशिसं
स्थितं॥ ॐ कृणुष्वेति वा ॐ अग्नये वा रक्तदंड श्कस्तात् सरस्य तिने ष्य ध्वजा ध्वचो