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वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary

भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा

DevanagariHindipublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 21, कुल 192 में से

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पृष्ठ 21

की गई है। शब्दों के नित्य होने के ही कारण व्याकरण शास्त्र बनाना सार्थक है अन्यथा
शब्दों की अनित्यता से सुस्थिर व्याकरण का बनाना सम्भव न होता। अतः साधु शब्दों के
परिज्ञान के लिए व्याकरणागम की रचना वेद के आधार पर की गई।
आगम प्रामाण्य
आगम समस्त प्रमाणों में श्रेष्ठ है। अनुमान प्रमाण में आगम का अन्तर्भाव नहीं हो
सकता क्योंकि आषाढ़ में बोया गेहूँ और कार्तिक में बोये हुए धान से फल उत्पन्न होना
सम्भव नहीं है। अतः शक्ति के भेद से वस्तुस्थिति में भेद हो जाता है। धर्माधर्म निर्णय
के लिए भी आगम ही प्रमाण है। शंख की पवित्रता की भाँति मनुष्य के शिर का कपाल
अनुमान द्वारा पवित्र सिद्ध नहीं किया जा सकता।
अनुमान में सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि वह किसी वस्तु को एक तर्क से सिद्ध करता है
फिर विपरीत तर्क से खण्डित हो जाता है।
अभ्यास—भी अनुमान में अन्तर्हित नहीं हो सकता। मणि के मूल्य में तारतम्य का
ज्ञान अनुमान से नहीं हो सकता।
अदृष्ट भी प्रत्यक्ष और अनुमान से परे ही है। पितरों, राक्षसों और पिशाचों की सिद्धियाँ
प्रत्यक्ष अथवा अनुमान नहीं हैं।
वाक्यपदीयकार के मत में प्रमाण
इन विवेचनों से प्रतीत होता है कि वाक्यपदीयकार प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द, अभ्यास
और अदृष्ट इस प्रकार ५ प्रमाण मानते हैं।
प्रत्यक्ष
वाक्यपदीयकार के मत में प्रत्यक्ष दो प्रकार का है एक लौकिक और दूसरा अलौकिक।
लौकिक प्रत्यक्ष तो हम लोगों का है किन्तु अलौकिक प्रत्यक्ष ऋषियों का है जो बिना इन्द्रिय
की सहायता के ही होता है और लोक उसे अपने प्रत्यक्ष से कम महत्त्व नहीं देता।
वा० १। ३७-४० ।।
अनुमान
प्रत्यक्ष के अतिरिक्त अनुमान प्रमाण की विशेष सिद्धि के उपाय तो नहीं वर्णित हैं किन्तु
उसका खण्डन भी नहीं किया है अतः 'अप्रतिषिद्धं ह्यनुमतं भवति' न्याय के आधार पर
स्वीकार किया जाता है कि वाक्यपदीयकार अनुमान प्रमाण स्वीकार करते हैं।
शब्द ( आगम )
शब्द को प्रमाण स्वीकार करने के लिए वाक्यपदीयकार ने अपनी पूरी शक्ति लगा दी है।
ऊपर कहे गए समस्त तर्क आगम को प्रमाण ही सिद्ध कर रहे हैं।
अभ्यास
वाक्यपदीयकार ने अपनी ३५वीं कारिका के आधार पर अभ्यास नाम के प्रमाण की
चर्चा की तथा कहा कि 'जो मणि आदि के मूल्यों के तारतम्य का ज्ञान है वह दूसरों को बताया
नहीं जा सकता किन्तु अभ्यास से ही होता है, इससे पता चलता है कि इनको अभ्यास नाम
का प्रमाण भी स्वीकृत रहा होगा। दूसरे दार्शनिकों का कहना है—'कल मेरा भाई आएगा