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सर्वकोश
वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary

भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा

DevanagariHindipublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 188, कुल 192 में से

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पृष्ठ 188

ः? अवाचकः?), धर्म्यास्तु समयोचिताः..."
Wait! "साधुरधर्मेषु धर्म्यास्तु समयोचिताः"!
Look at the words in line 4:
"शूद्रादीनां साधुर[???] किन्तु धर्म्य[??] एव वाचकाः"!
WAIT!
Look at line 4:
"शूद्रादीनां साधुरधर्मेषु किन्तु धर्म्या एव वाचकाः"???
WAIT! Look at:
"साधुर" then:
'अ'? No, look at line 4:
"शूद्रादीनां साधुरवाचकः" -
Wait, is that "साधुरवाचकः"?
स, ा, ध, ु, र, व, ा, च, क, ः. Yes, "साधुरवाचकः"!
Now look at the next words:
"किन्तु" (क + ि + न् + त + ु)
Then:
"धर्माधव"?
Wait! Is it "धर्म्या एव"?
Wait, look at "ध", then "र्म्या":
ध, र्म, bottom has 'य' loop, top has 'ा' and repha = र्म्या!
Wait, what is the next letter?
Is it 'स'?
Wait, look at: "धर्म्याश्च"?
Wait, look at the word: "धर्म्या एव"?
Wait! If it is "धर्म्या एव", why did I see two letters