वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)
Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary
भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा
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तथा तेऽपि अनुगम्येरन् नानुगम्यन्ते अतो न वाचकाः करः हस्त पाणिरित्येवमादिषु
अभियुक्तोपदेशादनादिरमीषामर्थेन सम्बन्धः तस्मात्साक्षाद्बोधकत्वं साधुत्वं परम्परया
बोधकत्वमसाधुत्वमिति भावः ॥ १५१ ॥
बड़े बूढ़े वैयाकरण जैसे साधु ( कर, हस्त और पाणि ) शब्दों को पर्याय मानते हैं और
उनका व्याकरण सूत्रों से साधुत्व भी मानते हैं वैसे असाधु शब्दों का व्याकरण शास्त्र द्वारा
साधुत्व और पर्याय नहीं मानते । इसलिए असाधु शब्द साक्षाद् अवाचक हैं ॥ १५१ ॥
साधौ प्रयोक्तव्ये कथमसाधुच्चारणं कुतो वा ततो बोध इत्यमुमर्थं दृष्टान्तेनोपपादयति—
साधु शब्दों को सिखाते समय असाधु शब्द का उच्चारण तो हो जाता है—
अम्वाम्बेति यथा बालः शिक्षमाणः प्रभाषते ।
अव्यक्तं तद्विदां तेन व्यक्ते भवति निर्णयः ॥ १५२ ॥
यथा अम्वाम्बेति शिक्षमाणः बालः अव्यक्तं प्रभाषते तद्विदां अव्यक्त-
प्रकृति व्यक्तं जानतां तेन अव्यक्तेन व्यक्ते साधौ निर्णयो साधुविषयकं ज्ञानं
भवति इति । अव्यक्तशब्दश्रवणपूर्वकंव्यक्तशब्दज्ञानाद्बोध इत्यर्थः ॥ १५२ ॥
जैसे बालक को अम्बा अम्बा सिखाया जा रहा है किन्तु बोलने में असमर्थ बालक अव्यक्त
( व, वं ) बोलने लगता है । किन्तु इसको समझने वाले लोग उस अव्यक्त ( व, वं ) से
अम्बा अम्बा का ही निर्णय करते हैं । (अर्थात् साधु शब्द का अनुमान कर लेते हैं ।) ॥१५२॥
दार्ष्टान्तिकमाह—
एवं साधौ प्रयोक्तव्ये योऽपभ्रंशः प्रयुज्यते ।
तेन साधुव्यवहितः कश्चिदर्थोऽभिधीयते ॥ १५३ ॥
एवं साधौ गौरित्यादौ प्रयोक्तव्ये प्रयोक्तुरिष्टे योऽशक्त्या प्रमादाद्वा अप-
भ्रंशः गावीत्यादि प्रयुज्यते तेन अपभ्रंशेन साधुव्यवहितः साधुव्यवधानेन
कश्चिदर्थोऽभिधीयते न साक्षादित्यर्थः ॥ १५३ ॥
इसलिए जो साधु शब्द का प्रयोग करने के स्थान पर अशक्ति अथवा प्रमाद से असाधु
( अपभ्रंश ) शब्द का प्रयोग करता है उसके उस असाधु शब्द से जो कोई अर्थ प्रतीत होता है
वह साधु शब्द के व्यवधान से प्रतीत होता है ( अर्थात् साधुशब्दानुमान द्वारा ही
प्रतीत होता है ) ॥ १५३ ॥
नन्वेवं साधुशब्दमजानतां स्त्रीशूद्रचण्डालादीनां बोधो न स्यात्तेषामसाधुशब्द-
श्रवणेन साधुशब्दस्मरणासंभवादत आह—
किन्तु जो साधु शब्द नहीं जानते उन्हें असाधु शब्द सुनने से साधु शब्द का स्मरण भी
नहीं होता उनके लिये तो साधु ही अवाचक है । क्योंकि—
पारम्पर्यादपभ्रंशा विगुणेष्वभिधातृषु ।
प्रसिद्धिमगता येषु तेषां साधुरवाचकः ॥ १५४ ॥